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2 जून 2023 की वो शाम... न भूलने वाला दर्द: कोरोमंडल एक्सप्रेस हादसे के तीन साल बाद भी हवा में गूंजती हैं चीखें

Published: Tue, 02 Jun 2026 11:44 AM (IST)

ओडिशा के बालेश्वर में 2 जून 2023 को हुए कोरोमंडल एक्सप्रेस हादसे को तीन साल हो गए हैं, जिसमें 296 ...और पढ़ें

कोरोमंडल एक्सप्रेस हादसा

कोरोमंडल एक्सप्रेस हादसा

HighLights

  1. 2 जून 2023 को ओडिशा में हुआ था भीषण हादसा।

  2. हादसे में 296 लोगों की मौत, 1200 से अधिक घायल।

  3. सिग्नलिंग चूक बनी दुर्घटना का मुख्य कारण, सीबीआई जांच।

संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल (ओडिशा)। वह 2 जून 2023 की शाम थी। किसी मां ने बेटे से कहा था, "घर पहुंचकर फोन करना।" किसी पत्नी ने पति के लिए रात का खाना बचाकर रखा था। किसी बच्चे को अपने पिता का इंतजार था। किसी नवविवाहित जोड़े ने आने वाले कल के सपने सजाए थे। 

लेकिन ओडिशा के बालेश्वर जिले के बहानागा बाजार स्टेशन पर कुछ ही पलों में सैकड़ों परिवारों की दुनिया उजड़ गई। चेन्नई जा रही कोरोमंडल एक्सप्रेस लूप लाइन पर खड़ी एक मालगाड़ी से टकरा गई। 

19 डिब्बे पटरी से उतर गए

टक्कर इतनी भीषण थी कि उसके 19 डिब्बे पटरी से उतर गए। तभी पटरी से उतरे डिब्बे बगल की लाइन से गुजर रही बेंगलुरु-हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस से जा भिड़े। कुछ ही सेकंड में सब कुछ बदल गया। लोहे के डिब्बों के बीच दब गईं सैकड़ों जिंदगियां और शुरू हुई देश की सबसे भयावह रेल त्रासदियों में से एक की कहानी।

उस रात बहानागा में सिर्फ ट्रेनें नहीं टकराई थीं, बल्कि हजारों सपने और अनगिनत उम्मीदें भी बिखर गई थीं। चारों ओर चीख-पुकार, कराह और मदद की गुहार सुनाई दे रही थी। कोई मलबे में दबा अपने स्वजन को पुकार रहा था, तो कोई अपने बच्चे को खोज रहा था। 

हादसे में 296 लोगों की मौत हुई

कई मोबाइल फोन घंटों तक बजते रहे, लेकिन उन्हें उठाने वाला कोई नहीं था। इस हादसे में 296 लोगों की मौत हुई और 1,200 से अधिक यात्री घायल हुए। कई लोग ऐसे थे जो अस्पताल से तो लौट आए, लेकिन कभी सामान्य जीवन में नहीं लौट सके। 

किसी ने अपना पैर खो दिया, किसी ने हाथ, तो कई लोग हमेशा के लिए व्हीलचेयर तक सीमित हो गए। कुछ पीड़ित आज भी ऐसी स्थिति में हैं कि अपने दैनिक कार्यों के लिए पूरी तरह परिजनों पर निर्भर हैं। उनके लिए जिंदगी चल रही है, लेकिन वह पहले जैसी नहीं रही। 

परिवारों को अपने स्वजन का शव तक नसीब नहीं

कई परिवारों को अपने स्वजन का शव तक नसीब नहीं हुआ। कुछ ने डीएनए जांच रिपोर्ट आने तक हफ्तों इंतजार किया। कई शव इतने क्षत-विक्षत थे कि पहचान संभव नहीं थी। उन परिवारों के लिए 296 सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी पूरी दुनिया के उजड़ जाने की कहानी है। 

हादसे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ,ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने घटनास्थल का दौरा किया था। जांच सीबीआई को सौंपी गई। बाद में सामने आया कि सिग्नलिंग प्रणाली में गंभीर चूक इस दुर्घटना का प्रमुख कारण बनी। 

हर ट्रेन कर देती है उस भयावह रात की याद ताजा

रेलवे ने सुरक्षा व्यवस्था में सुधार और 'कवच' जैसी प्रणालियों के विस्तार की घोषणा की, लेकिन जिन घरों के चिराग बुझ गए या जिनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई, उनके लिए कोई सुधार उनके अपनों को वापस नहीं ला सका।

आज, तीन साल बाद भी बहानागा बाजार स्टेशन से गुजरती हर ट्रेन उस भयावह रात की याद ताजा कर देती है। देश आगे बढ़ गया है, लेकिन 296 मृतकों के परिवारों और सैकड़ों घायल यात्रियों के लिए समय मानो उसी रात पर ठहरा हुआ है।

बहानागा की त्रासदी केवल एक रेल दुर्घटना नहीं, बल्कि उन अधूरे सपनों, बिखरे परिवारों और अनंत पीड़ा की कहानी है, जो तीन साल बाद भी लोगों की आंखों में आंसू और दिलों में टीस बनकर जिंदा है।