30 साल बाद गांव लौटेंगे जातीय बहिष्कार के शिकार 30 दलित परिवार, सुरक्षा और पुनर्वास की मांग

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HighLights
30 अनुसूचित जाति परिवार 30 साल बाद गांव लौट रहे हैं।
आंबेडकर सेवक संघ ने सुरक्षा, भोजन और पुनर्वास की मांग की।
परिवारों के लिए 6 महीने तक पुलिस सुरक्षा की भी मांग।
जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। करीब 30 साल पहले गांव से बहिष्कृत किए गए 30 अनुसूचित जाति परिवार रविवार, 11 अक्टूबर को अपने पैतृक गांव धलाबंध लौटने जा रहे हैं।
उनकी सुरक्षा, रहने और भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग को लेकर आंबेडकर सेवक संघ के प्रदेश अध्यक्ष मनोरंजन जेना और संगठन के अन्य पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी के समक्ष मांगें रखी हैं।
संघ की ओर से कहा गया है कि लंबे समय से अपने गांव से अलग रह रहे ये परिवार अब अपने पैतृक घर लौटने की प्रक्रिया में हैं।
गांव लौटने के बाद उनके सुरक्षित रहने, भोजन, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
परिवारों के स्थायी पुनर्वास और रोजगार की व्यवस्था होने तक प्रशासन से तत्काल अस्थायी पुनर्वास केंद्र बनाने तथा पालीथिन, टेंट या अन्य उपयुक्त आश्रय उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
संघ ने मांग की है कि परिवारों के आत्मनिर्भर होने तक उन्हें भोजन, राशन और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। स्थायी पुनर्वास और आजीविका की व्यवस्था होने तक छह महीने तक भोजन, आवास और अन्य आवश्यक मानवीय सहायता भी दी जाए।
इसके अलावा पात्र परिवारों को राशन कार्ड, खाद्य सुरक्षा, विभिन्न पेंशन योजनाओं, आवास योजनाओं और अन्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की मांग की गई है। परिवारों को मनरेगा, आजीविका मिशन और अन्य रोजगारपरक योजनाओं में भी शामिल करने पर जोर दिया गया है।
छह महीने तक पुलिस सुरक्षा की मांग
गांव लौटने के दौरान किसी भी अप्रिय घटना, धमकी या हमले की आशंका को देखते हुए संघ ने इन परिवारों को पर्याप्त पुलिस सुरक्षा देने की मांग की है।
साथ ही गांव में दोबारा बसने के बाद भी छह महीने तक पुलिस सुरक्षा जारी रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया गया है।
संघ ने जिला प्रशासन, ब्लॉक प्रशासन, तहसील और पुलिस प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित कर एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने की मांग भी की है, ताकि परिवारों की स्थिति की नियमित निगरानी की जा सके और उनकी समस्याओं का समय पर समाधान हो।
उल्लेखनीय है कि एक मामले में गवाही देने को लेकर इन परिवारों को जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उन्हें अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। अब करीब तीन दशक बाद उनकी अपने पैतृक गांव में वापसी की तैयारी है।
