पंकज नागपाल, हांसी : नगर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक इस मंदिर को जनसाधारण समाधा मंदिर के नाम से जानता है। शहर से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर की काफी महत्ता है। प्रत्येक मंगलवार को नगर के अनेक श्रद्धालु इस मंदिर में माथा टेकने के लिए आते है। सुबह से सायं तक मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। हांसी के दक्षिण पश्चिम में स्थित यह मंदिर गौसाई गेट से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। सिसायपुल से पश्चित दिशा में नहर के साथ-साथ जाने वाली सड़क समाधा मंदिर से होते हुए गांव लालपुरा में तक जाती है।

मंडी सैनियान से पीछे खरड़ चुंगी से भी मंदिर तक पक्के रास्ते से जाया जा सकता है। 1980 ई. के दशक तक यह मंदिर शहर से दूर खेतों व बागों से घिरा हुआ था। मंदिर के चारों और इसकी भूमि पर जाल, कीकर, पीपल, नीम, काबली सरीखे वृक्ष थे जिन्हें बाद में कुछ एक को छोड़ कर काट दिया गया। मंदिर भी पुरानी तरह का बना हुआ था। मंदिर के उत्तर-पूर्व में तालाब है। इसका प्रवेश द्वार पक्की सड़क पर है। इसके बाद एक और पक्का द्वार है तथा द्वार पर अभी हाल में बाबा जगन्नाथ पुरी की मूर्ति बनाई गई है। अंदर एक हाल कमरा है जहां साधु संत सत्संग करते है।

हाल कमरे के बाहर धूना है व जाल के पेड़ के साथ एक छोटा पीपल का पेड़ है। यहीं से उत्तर दिशा में मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है। अंदर जाते ही दायें भाग में शिवालय है उससे आगे बढ़ने पर खुले आकाश के नीचे बाबा कल्याणपुरी की समाधि है कुछ वर्ष पहले इस समाधि स्थल पर एक भक्त ईश्र्वर कुमार जांगड़ा ने बाबा की एक मूर्ति भी रख दी है। बाबा की समाधि से पहले छोटी गुम्बददार छोटा कमरा था जिसके चारों दिशाओं के दरवाजे थे।

इसके साथ-साथ इसके पश्चित में बाबा रविपुरी की समाधि के कमरे को भी हटा दिया गया है। पहले यह मंदिर एक साधारण कमरे में था। सन् 2004 में इन पर एक बड़ा हाल बना दिया गया है। इसके बाद एक लम्बा चौड़ा हाल कमरा ऊंचाई पर है यहां जाने के लिए सुंदर सीढ़ियां बनी है। हाल कमरे में जाते ही ठीक सामने हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा है, यह मूर्ति दक्षिण मुखी है। इस मूर्ति के दायें व बायें भाग में एक ऊंचा चबूतरा बना है जिस पर अन्य देवी देवीताओं की सुंदर मूर्तियां है इस देवालय के नीचे एक सुंदर हाल कमरा भी बना हुआ है जो किसी विशेष अवसर पर भक्तों के रूकने के लिए बनाया है।

यह नया मंदिर कुछ समय पहले की दिल्ली के एक महाजन भक्त इन्द्रपाल मित्तल ने बनवाना शुरू किया था। इससे पहले यह मंदिर इसी स्थान पर थोड़ा पहले एक छोटे कमरे में था। यहां पर हनुमान जी कि व अन्य देवी देवीताओं की की छ: मूर्तियां थी। बाबा की समाधि पर भी एक बड़ी छत शहर के सेठ दुनीचंद छबीलदास पेड़े वालों ने 2003 में बनवाई है। बाबा जगन्नाथपुरी की समाधी के पश्चित में मंदिर के भाग में अन्य संतों की समाधियां है जिनमें मंदिर के प्रांगण के प्रवेश द्वार से पास बाबा दौलतपुरी व आगे चल कर बाबा रविपुरी की समाधी अच्छी हालत में बनी हुई है। बाबा बुद्धपुरी के समय में मंदिर में लगभग दो करोड़ रूपया भक्तों ने लगाकर निर्माण करवाया था। जैसा की पहले कहा गया है कि समाधी व समाध का अपभ्रंश समाधां है। इस मंदिर का नाम बाबा जगन्नाथ पुरी जी की समाधी के नाम से पड़ा है।

चमत्कारी बाबा जगन्नाथ पुरी के नाम से हुआ है मंदिर का नामकरण

बाबा जगन्नाथपुरी मध्यकाल में एक चमत्कारी सिद्ध संत हुए है। बाबा ने इस क्षेत्र में धर्म के नाम पर फैले भेदभाव व पाखंड का खंडन कर समाज में हर व्यक्ति को मिलजुल कर प्रेम से रहने का संदेश दिया व पाखंडी चमत्कारों का मुंहतोड़ जवाब देकर पाखंडियों की आंखें खोली, भयभीत जनसाधारण के साथ-साथ अन्य जीवों को भी भयमुक्त किया। बाबा जगन्नाथ पुरी का जन्म सन् 1570 ई. में भादो माह की कृष्णपक्ष की पंचमी के किवंदती के अनुसार भिवानी जिले के तोशाम कस्बे में राजपूत परिवार सूरजाराम तंवर के घर पर हुआ। जन्म के समय इनके पारिवारिक गुरू संत पवनपुरी जी मौजूद थे।

जब नवजात शिशु को गुरू के आशीर्वाद के लिए लाया गया तो बाबा पवनपुरी ने नवजात शिशु को अपने आशीर्वाद देने के साथ-साथ शिशु को भिक्षा में मांग लिया। बाबा के समझाने पर कि बालक आलौकिक है व विशेष प्रायोजन के लिए जन्मा है। काफी आना-कानी के बाद सूरजाराम के परिजनों ने एक शर्त पर अपने शिशु को देना स्वीकार किया कि शिशु दो वर्ष इसी परिवार में रहेगा व इस दौरान सूरजा दम्पति के घर अगर एक और शिशु ने जन्म लिया तो बाबा पवनपुरी के बच्चे के आलौकिक होने के कथन को सत्य माना जायेगा। दो वर्ष का समय पंख लगाकर उड़ गया। इस दौरान सूरजराम के घर एक और बालक ने जन्म लिया था। निर्धारित समय पर संवत् 1629 विक्रमी फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की दसवीं तारीख के दिन परिजनों ने अपने गुरू पवनपुरी को अपना दो वर्ष का बेटा सौंप दिया। इस अवसर पर गुरू जी ने बालक का नाम जगन्नाथ रख दिया।

बाबा पवनपुरी अपने शिष्य बालक जगन्नाथ को साथ लेकर अपने डेरे गांव मातनहोल जिला रोहतक व झज्जर पहुंच गये। यहां जगन्नाथ पुरी 16 वर्ष तक रहकर शिक्षा-दीक्षा से परिपूर्ण होकर तेजस्वी संत बन गये। गुरू ने बाबा से पवनपुरी ने गुरूदीक्षा में हांसी में शंख बजाने का आदेश दिया। गुरू के आदेश पर हांसी पहुंचे बाबा जगन्नाथ पुरी ने अपने गुरू का आदेश पाकर अपनी गऊओं के साथ 1588ई. संवत विक्रमी सन् 1647 के भादो माह की कृष्ण पंचमी के दिन हांसी में प्रवेश किया। हांसी में उन दिनों मुस्लिम धर्म का बहुत पवित्र तीर्थ स्थल बन चुका था। इसे 'हांसी शरीफ' के नाम से पुकारा जाने लगा था। '

हांसी शरीफ' की पवित्रता को कायम रखने के लिए यहां गैर मुस्लिम (हिन्दूओं) लोगों को बसने तक पर रोक थी। बाबा जगन्नाथ पुरी के गुरू ने जो आदेश दिया था, उसके पीछे गहरा राज भी था। बाबा जगन्नाथ पुरी ने हांसी की सीमा में प्रवेश कर शहर से थोड़ी दूरी पर घनघोर जंगल में नहर के उस पार एक स्थान पर अपना डेरा लगा लिया। बाबा जी ने डेरे में अपना धूना लगाकर चिमटा-त्रिशूल गाड़ दिया। सायंकाल पूजा अर्चना के समय बाबा ने संध्या भजन किया शंख फूंका व मृगछाला बिछाकर बैठ गये।

सायंकाल जैसे ही शंख की ध्वनि शहर तक पहुंची तो मुस्लिम बस्ती के लोगों के कान खड़े होना स्वाभिवक था, क्येांकि बरसों पहले हांसी को हिन्दू बस्ती से बदल कर इस्लामिक नगरी बनाया जा चुका था। शहर में तो क्या आसपास के गांव देहातों तक में मंदिर पूजक नहीं रहा था। यहां दरगाह चार कुतुब में चार सूफी संतों की मजारें थी। यह धारणा थी कि पूजा अर्चना के शोर से कब्रों में आराम फरमा रहे कुतुब हजरातों की रूहों शकून में खलल पड़ेगा। इसलिए कुतुबों के समय में ही इस क्षेत्रा को काफिरों से मुक्त करवा दिया गया था। महंत बुद्धपुरी के कार्यकाल में हुआ मंदिर का विकास किया। हनुमान जी व अन्य देवताओं के नये भवन का निर्माण हुआ। तालाब पक्का किया गया, तालाब के मध्य शिव मंदिर का निर्माण किया गया, साधु संतों के ठहरने के लिए अन्य भवन भी बनाये गये। समाध मात्र बाबा जगन्नाथ की समाधी में न होकर हनुमान जी के मंदिर के रूप नाम से विख्यात हो चुका है।

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