चंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़: कुमाऊं में मकर संक्रांति को मनाये जाने वाले घुघुतिया त्योहार का विशेष महत्व है। उत्तराखंड में यह त्योहार अलग ही पहचान रखता है। इस त्योहार की कथा मुख्यत: कौवा और घुघुतिया राजा पर केंद्रित है।

कुमाऊं में चंद वंश का शासन था। राजा कल्याण चंद नि:सन्तान थे। राजा ने बागेश्वर जाकर भगवान बागनाथ की पूजा की और मकर संक्रांति के दिन उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। उसका नाम निर्भयचंद रखा गया। उसकी मां उसे प्यार से घुघुती कहकर पुकारती थी। घुघुती के गले में एक मोतियों की माला थी। माला को देखकर घुघुती खुश रहता था।जब वह रोता तो उसकी मां उसे चुप कराने के लिए कहती थी' काले कौवा काले, घुघुती की माला खाले'घुघुती की मां की आवाज सुनकर इधर-उधर से कौवे का जाते और उसकी मां उन्हें पकवान देती। धीरे-धीरे कौवा और घुघुती एक दूसरे का मनोरंजन करने लगे। राजा के दरबार मे एक मंत्री घुघुती को मारना चाहता था, क्योंकि राजा की कोई दूसरी संतान नहीं थी। एक दिन राजा का मंत्री घुघुती को उठाकर दूर जंगल में ले गया। तभी उसके चारों ओर कौवे मंडराने लगे। कौवे घुघुती के गले की माला छीनकर राजमहल की ओर लाए। सब समझ गए कि घुघुती की जान खतरे में है। राजा तथा उसके अन्य मंत्री जंगल की ओर दौड़े। एक पेड़ के नीचे घुघुती अचेत पड़ा था। इस प्रकार कौवों ने घुघुती की जान बचाई और मंत्री को कठोर दंड दिया गया। तभी से मकर संक्रांति को लोग आटे के डिकरे बनाते और कौओं को खिलाते।

-- चंद काल से ही यह परंपरा रही है। जिसे उत्तरायणी के दिन हर्षोल्लास से मनाया जाता है। कौवे बुलाने का रिवाज भी तभी से हैं। अब यह हमारी पहचान बन चुका है।

-- गोपाल दत्त भट्ट, संस्कृतिकर्मी

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