लखनऊ, [अमित मिश्र]। मंच पर बनारस घराने के पद्मभूषण पंडित राजन-साजन मिश्र की जोड़ी का अतुलनीय ख्याल गायन हो और सुनने वालों में केंद्र व प्रदेश सरकार के मंत्री से लेकर राजधानी की तमाम नामचीन हस्तिया मौजूद हों तो संगीत में डूबे माहौल की कल्पना सहज ही एक अलग रूहानी दुनिया में ले जाती है। अपनी शामों के लिए मशहूर अवध में फिर ऐसी ही एक शाम शनिवार शाम सजी। मेजबानी थी जागरण फोरम की और इसमें शामिल होने वाले लोग वह थे, जिन्होंने पूरे दिन नीति निर्धारकों की भूमिका में प्रदेश के विकास पथ की परिकल्पना की थी। दिन भर चले मंथन के बाद शाम को पंडित जी की सुर लहरियों ने मानो औषधि का काम किया। ठहरी हुई गंभीर आवाज में आलाप शुरू होने के बाद मुग्ध श्रोताओं की चेतना वापस सासारिक जगत में तब ही लौटी, जब पद्मभूषण बंधुओं ने सुरों को विराम दिया।

'चलो आज कल बनाते हैं' के लक्ष्य को लेकर उत्तर प्रदेश के विकास की संभावनाओं पर विमर्श के लिए शनिवार को आयोजित जागरण फोरम में दिन भर वह रास्ता तलाशा गया, जिस पर नियंताओं को समय के साथ चलना है। शाम को बारी थी दिन भर के मंथन के बाद सुकून देने वाले शास्त्रीय संगीत की। मंच पर जब पंडित राजन-साजन मिश्र आए तो गोमतीनगर स्थित होटल ताज का सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मौजूद अतिथियों के चेहरे पर कुछ खास घटित होने की चमक आ गई। जोड़ी के बड़े भाई राजन मिश्र ने ओम् के गहरे उच्चारण के साथ आलाप लिया तो गूंजती ठहरी आवाज से सभागार भी गहरी शाति में डूब गया। उन्होंने साथी कलाकारों के साथ वाद्ययंत्र मिलाए और पलभर के लिए गायन रोक कर सभागार में मौजूद लोगों से सीधे मुखातिब हो गए।

बोले- ''.संगीत पूजा है, .इबादत है, .ख्याल गायन तो दो-चार घटे चलता है, लेकिन. आज इतना लंबा नहीं, कुछ छोटी रचनाएं और भजन., फिर आप जो कहें।'' राग जोग पर आधारित बंदिश 'साजन मोरे घर आए, मन अति सुख पाए' को मध्य लय की तीन ताल में गायक बंधुओं ने जब मखमली आवाज में परोसा तो लोग वाह-वाह कर उठे। राग जोग में ही एक और बंदिश उन्होंने द्रुत लय की एक ताल में पेश की। 'सजन कासे कहूं अपने मन की बतिया, गिन-गिन रैन बिताऊं तड़पत हूं निस रतिया' की प्रस्तुति ने लोगों का मन मोह लिया। आमतौर पर ठुमरी कम सुनाने वाले पद्मभूषण बंधु चूंकि लखनऊ में थे और सामने बैठे श्रोताओं में से लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने फरमाइश भी कर दी थी, इसलिए पंडित राजन-साजन 'बराबर की ठुमरी' सुनाने को तैयार हो गए। आलापचारी के साथ विलंबित लय में उन्होंने 'न मानूंगी, पिया के मनाए बिना.' से शुरुआत करते हुए राग खमाज की तीन ताल में द्रुत लय लेते हुए जब महाराज बिंदादीन की बंदिश- 'काह करूं देखो गारी देत कन्हाई रे, मैं तो लाखन बार समझाई रे, मटकी पकड़ मेरी झटकी-पटकी, बिंदा कहत सगरे लोगन में मेरी बतकहाई रे', सुनाई तो लोग झूम उठे।

मुस्कुराते हुए पंडित राजन मिश्र ने हारमोनियम पर साथ दे रहे पं.धर्मनाथ मिश्र से सुरों में 'सवाल-जवाब' की जुगलबंदी परोसी तो लोग दाद दिए बिना न रह सके। तबले पर राजेश मिश्र और तानपुरे पर शालिनी व रजनी के अलावा खुद पंडित राजन मिश्र वाद्य यंत्र सुरमंडल के साथ सुरों को संगीत में पिरो रहे थे। इसी क्रम में पंडित बंधुओं ने संध्या में संगीत के प्रवाह को विस्तार देते हुए गया के विद्वान पं.रामू मिश्र से प्राप्त पुराने साहित्य की बंदिश- 'मोरी-तोरी, तोरी-मोरी न बनेगी श्याम., सुनाकर लोगों को शास्त्रीय संगीत की गहराइयों से जोड़ दिया। इसी बंदिश की अगली पंक्तिया- '.तुम नंदलाल मोसे छलबतिया कीन्हीं, मुरली बजा के मेरो मन हर लीन्ही, निपट निडर कपटी श्याम तुडो प्रणाम, मोरी-तोरी.' भी लोगों ने खूब सराहीं। शास्त्रीय गायन की सुर लहरियों से सजी शाम की अंतिम प्रस्तुति राग भैरवी में सजे भजन 'अब कृपा करो श्रीराम, राम दुख टारो, इस भवबंधन के दुख से हमें उबारो' के माध्यम से सभागार में मौजूद लोगों को आत्मिक शाति की अनुभूति हुई। इससे पहले सास्कृतिक संध्या में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत दैनिक जागरण लखनऊ के स्थानीय संपादक दिलीप अवस्थी ने किया। सुरों से सजी शाम के वाहक पंडित राजन-साजन मिश्र व उनके सहयोगियों का अभिनंदन जागरण समूह की ओर से सुनील गुप्त, संदीप गुप्त, मनोज झा, विष्णु त्रिपाठी व राजकिशोर ने किया।

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