ठेले पर फेरी लगा बेचे कपड़े, खड़ा किया कारोबार

आकाश राज सिंह, हाथरस : अविभाजित भारत की सीमा अफगानिस्तान तक फैली थीं। वहां पर हिंदू भले ही अल्पसंख्यक रहे हों, लेकिन मुस्लिमों के साथ उनके संबंध दोस्ताना थे। आजादी के बाद भारत पाकिस्तान के बंटवारे ने दोनों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया। पेशावर के पास जिला हजारा के एक गांव में उस समय 15 वर्षीय किशोर यशपाल भाटिया ने कत्लेआम अपनी आंखों से देखा था। कत्लेआम से बचने के लिए पिता संतराम के साथ यशपाल दिल्ली के रास्ते हाथरस आए। यहां व्यापार में ऐसा मन लगा कि यहीं के होकर रह गए। मिलजुल कर रहते थे हिंदू व मुस्लिम 91 वर्षीय यशपाल उस मंजर को याद करते हैं आंखों में आंसू आ जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनका परिवार जिला हजारा की तहसील हरीपुर के गांव कोट नजीब उल्ला में रहता था। यह अफगानिस्तान की सीमा से सटा भारत का अंतिम गांव था। उनके परिवार में तीन भाई व तीन बहन थीं। ताऊ व चाचा भी वहीं रहा करते थे। हिंदू व मुस्लिम मिलजुलकर वहां जीवनयापन कर रहे थे। रियासत में करते थे कर वसूली का कार्य यशपाल बताते हैं कि उनके बुजुर्ग छोटी रियासत के मालिकों के यहां लगान-कर वसूली का कार्य करते थे। हिसाब-किताब रखने के लिए पिताजी वहां रहा करते थे। उनके खेतों में फसलें उगाने का कार्य मजदूरों से कराते। उसका एक बड़ा हिस्सा मालिक को देने के बाद शेष फसल को मजदूरों के साथ बांट लिया जाता था। उस समय सामान के बदले सामान दिया जाता था। अलग-अलग कुओं से भरते थे पानी उस समय हिंदुओं की संख्या भले ही पांच फीसद रही हो मगर मुस्लिमों के साथ सभी मिलजुलकर रहते थे। हिंदुओं की लड़कियों के विवाह में मुस्लिम दूध, सूखा सामान दान में देते और काम भी कराते। पांच सौ मीटर पर दोनों के कुआं अलग-अलग होते। छुआछूत भी थी। सफर करते समय मुस्लिमों से छू जाने पर हिंदू महिलाएं घर आकर स्नान करती थीं। इसका मुस्लिम बुरा नहीं मानते थे। वह इसे उनका धर्म बताकर नजरअंदाज कर देते थे। 1946 से शुरू हुआ कत्लेआम, फिर पलायन यशपाल बताते हैं कि देश को आजाद होने से पहले जिन्ना बंटवारे पर अड़े तब वहां अफवाहों का दौर शुरू हो गया। लोगों के बीच यह आभास होते ही कि अब देश का बंटवारा तय है, मारकाट शुरू हो गई थी। मुस्लिमों ने हिंदुओं के घरों में लूटपाट व उनकी हत्याएं करनी शुरू कर दी। एबटाबाद शहर के गांव हवेलिया स्थित एक स्कूल में कई हिंदू परिवारों को बच्चों सहित बंद कर रात के दो बजे उसमें आग लगा दी गई थी। इस कत्लेआम का वीभत्स मंजर देख हिंदुओं ने वहां से पलायन शुरू कर दिया। परिवार सहित ट्रेन से पहुंचे जम्मू वहां के मुस्लिम, हिंदुओं के सामान को लूटकर उनका कत्लेआम कर रहे थे। पिता संतराम भाटिया के साथ हमारा परिवार रात में खाली हाथ ही ट्रेन से अमृतसर होते हुए किसी तरह जम्मू में अपनी ननिहाल पहुंचा। कई जगह ट्रेनों को रास्ते में जलते हुए देखा। जम्मू में डेढ़ साल रहने के बाद वर्ष 1948 में दिल्ली होते हुए हाथरस पहुंचे। आर्य समाज मंदिर के बरामदे में गुजारी जनवरी की रातें यशपाल बताते हैं कि पिताजी के साथ हमारा परिवार हाथरस में सासनी गेट स्थित आर्य समाज मंदिर के बरामदे में 1949 की जनवरी का महीना बिताया। उसके बाद चट्टनलाल मंदिर के पीछे दस रुपये महीने में एक कमरा लिया। इसमें सात परिवार एक साथ रहे। यहां पर पिताजी ने हाथठेले पर रखकर कपड़े बेचे। पिताजी के साथ फेरी लगाने हम भी जाया करते थे। पार्टनरशिप में किया कपड़े का कारोबार यशपाल बताते हैं कि वर्ष 1952-53 में पंजाबी मार्केट में मिली दुकान पर सूरजभान अग्रवाल के साथ 17 साल पार्टनरशिप में कपड़े का कारोबार किया। उसी दौरान 1955 में पिता संतराम भाटिया की मृत्यु होने के बाद कारोबार की जिम्मेदारी खुद संभाली। 14 अक्टूबर 1959 को दिल्ली निवासी मोतिया से विवाह हुआ। वह हरचरनदास स्कूल में शिक्षक रहीं। माता लाजवंती भी पिता के बाद स्वर्ग सिधार गईं। वर्जन -- सामाजिक कार्यों में शुरू से ही दिलचस्पी रही। लोकतंत्र रक्षक सेनानी की पेंशन व जमा पूंजी स्कूलों को दान कर दी। परिवार में तीन पुत्र व एक पुत्री हैं। एक पुत्र हर्ष बैंक से सेवानिवृत्त हैं। सुशील आगरा में तो दीपक पंजाबी मार्केट में कारोबार करते हैं। उम्र अधिक होने से अब ठीक तरह सुन नहीं पाता हूं। आज भी बंटवारे की विभीषिका को यादकर आंखे भर आती हैं। यह देश व देशवासियों के लिए उचित नहीं रहा। -यशपाल भाटिया, भारत-पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी के प्रत्यक्षदर्शी

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