गोरखपुर, जागरण संवाददाता। देश के बंटवारे ने जो दर्द दिया, वह आज 75 साल बाद भी लोगों के दिलों में ताजा है। बंटवारे के बाद पाकिस्तान में कत्लेआम शुरू हो गया। हिंदू व सिख परिवारों पर हमले होने लगे। लूटपाट मच गई। ऐसे में दो भाई घर छोड़कर किसी तरह भागकर भारत पहुंचे। बंटवारे ने घाव दिया तो हौसला व हिम्मत मरहम बनी। उन्होंने हार नहीं मानी और विपरीत परिस्थितियों में अपना मुकाम बनाया। करोड़ों का कारोबार खड़ा कर लिया। आज उनका परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा है।

सिंध से फैजाबाद और फिर गोरखपुर पहुंचे

सिंध प्रांत के सक्खर जिले के बलीराम साधवानी व पंजू मल किसी तरह परिवार के साथ फैजाबाद पहुंचे। उनके पास न रहने का ठिकाना था और भोजन का। शरणार्थी शिविर उनका सहारा बना। कुछ दिन तक उन्होंने फैजाबाद में केला बेचा। छह माह बाद बलीराम साधवानी अपनी पत्नी पार्वती देवी के साथ गोरखपुर आ गए। फेरी लगाकर किसी तरह अपने परिवार की आजीविका चलाने लगे। इसी बीच उन्हें गोरखनाथ में शरणार्थी कालोनी में आवास मिल गया। उन्होंने फेरी का काम छोड़कर सेठ गोविंद राम के ईंट भट्ठे पर नौकरी कर ली। यह भट्ठा असुरन में था। वह प्रतिदिन साइकिल से आते-जाते थे।

ईमानदारी से लिखी सफलता की नई कहानी

अपनी ईमानदारी से मालिक का विश्वास जीते और उनके खजांची बन गए। इसी बीच से सेठ गोविंद राम ने शाहपुर में एक और भट्ठा खोला, उसमें बलीराम साधवानी को हिस्सेदार बना लिया। इसके कुछ दिन बाद बलीराम साधवानी ने सेठ के सहयोग से शाहपुर में अपना एक भट्ठा खोल लिया। इसी क्रम में उन्होंने रसूलपुर, खजनी, महादेवा बाजार, सेंवई बाजार, सिसवा बाजार, झुंगिया बाजार व पिपराइच में कुल आठ भट्ठे लगा लिए। 1994 में उनका निधन हो गया। उनके पुत्र दीवानचंद साधवानी व मुरारीलाल साधवानी ने इस व्यवसाय को और विस्तार दिया। आज उनके पास 11 ईंट भट्ठे हैं।

मेरा जन्म गोरखपुर में 1952 में हुआ था। जब बड़ा हुआ तो पिताजी के संघर्ष का समय था। कुछ अपनी आंखों से देखा था और कुछ उन्होंने बताया था। सबकुछ छोड़कर उन्हें भारत आना पड़ा था। यहां शून्य से फिर उन्होंने शुरुआत की और अपनी मेहनत की बदौलत सबकुछ हासिल कर लिया। - मुरारीलाल साधवानी।

Edited By: Pradeep Srivastava