यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 13, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
विश्व रेडियो दिवस : कोरोना के कठिन समय में अपनेपन के साथ रेडियो ने जगाया विश्वास
दोस्तो इंटरनेट मीडिया के लगातार हो रहे प्रसार के बावजूद रेडियो ने श्रोताओं को अपने से बांधे रखा है। प्रधानमंत्री ...और पढ़ें

अंशु सिंह। कोरोना की दूसरी लहर में जब बीमारी ने 22 वर्षीय शोभित (बदला हुआ नाम) को अपनी चपेट में लिया, तो वह ओडिशा में एक क्वारंटाइन सेंटर में रहने को मजबूर हो गए। शुरू के दो-चार दिनों के बाद समय काटना मुश्किल होने लगा। उसी दौरान उनके पास ‘रे़डियो वालंटियर’ बनने का एक प्रस्ताव आया। जानकारी इकट्ठा करने के बाद शोभित को वह आइडिया इतना पसंद आया कि अगले कुछ दिनों में उन्होंने फोन से ही अपने अनुभवों को रिकार्ड कर उसे ‘रेडियो नमस्कार’ की टीम को भेजना शुरू कर दिया। जब लोगों ने सीधे क्वारंटाइन सेंटर से प्रभावितों को सुनना शुरू किया तो समाज में फैली तमाम भ्रांतियों से पर्दा उठने लगा। आम लोगों में जागरूकता आई। स्वयंसेवी संगठन ‘यंग इंडिया’ द्वारा शुरू किए गए ‘रेडियो नमस्कार’ के अध्यक्ष एन अंसारी बताते हैं कि जब लोग अपने बीच के किसी शख्स को सीधे सुनते हैं तो उनमें एक भरोसा जगता है। यही वजह थी कि रेडियो वालंटियर्स की हमारी मुहिम काफी कामयाब रही। इसमें हमने कोणार्क जिले की 42 पंचायतों में स्थित क्वारंटाइन सेंटर से रेडियो वालंटियर्स की मदद से लोगों तक सीधी जानकारियां उपलब्ध करायीं। हमारे साथ आज 125 श्रोताओं का ग्रुप है। इसके अलावा, कोरोना काल में हमने स्थानीय प्रशासन एवं अन्य सामुदायिक रेडियो के साथ मिलकर टीकाकरण के प्रति जागरूकता लाने समेत अनेक कार्यक्रम किए। कई अभियान चलाए। इनके ‘जन सूचना नामक’ प्रोग्राम को भी काफी पसंद किया जाता है, जिसमें सरकार की योजनाओं, नागरिक अधिकारों के प्रति जानकारी दी जाती है। स्थानीय उड़िया एवं तेलुगु भाषा में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों से लोगों का सीधा जुड़ाव हो पाता है।
शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य से जुड़े शो
हम सब जानते हैं कि महामारी के दौरान ग्रामीण इलाकों के बच्चों के लिए पढ़ाई जारी रख पाना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया था। तब सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों के अलावा कम्युनिटी रेडियो ने एक अहम भूमिका निभायी। जैसे हरियाणा के नूंह जिले से संचालित सामुदायिक रेडियो ‘अल्फाज-ए-मेवात’ ने ‘रेडियो स्कूल’ नाम से एक प्रोग्राम चलाया, ताकि ग्रामीण तबके के गरीब बच्चों तक शिक्षा पहुंचायी जा सके। इसके अलावा, रेडियो पर हेल्थ काउंसिलिंग से जुड़े कार्यक्रम किए गए।
‘सावधान’ नामक शो के जरिये फेक न्यूज के प्रति लोगों को जागरूक किया गया। इतना ही नहीं, एक टोल फ्री नंबर जारी किया गया, जिस पर आसपास के करीब 225 गांवों के लोग अफवाहों के अलावा अपनी अन्य जिज्ञासाओं को शांत कर सके। महामारी के दौरान ज्यादातर प्रोग्राम स्थानीय समुदाय से मिलने वाले फीडबैक संदेश को रिकार्ड कर तैयार किए गए। इसी प्रकार, ‘गुड़गांव की आवाज’ सामुदायिक रेडियो हर हफ्ते ‘बावरा मौसम’ नाम से एक प्रोग्राम करता है, जिसमें किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर बातें होती हैं। स्टोरीटेलिंग के जरिये गंभीर समस्याओं का समाधान निकाला जाता है। इसी प्रकार, ‘हम होंगे कामयाब’ शो के माध्यम से स्टूडेंट्स को करियर से संबंधित टिप्स दिए जाते हैं।
कैंपस रेडियो के जरिये जनजागरूकता
दोस्तो, कम्युनिटी रेडियो मुख्यत: विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों, कृषि विज्ञान केंद्रों एवं शैक्षिक संस्थानों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय द्वारा संचालित रेेडियो को ‘कैंपस रेडियो' कहा जाता है। इन सामुदायिक रेडियो को दस से पंद्रह किलोमीटर के दायरे में सुना जा सकता है। इसे छोटा एफएम रेडियो भी कह सकते हैं। जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन के फाइनल ईयर के स्टूडेंट एवं आरजे प्रणव भोपाल स्थित ‘लेकसिटी वायस’ कैंपस रेडियो से जुड़े हैं, जो यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित है।
बीते डेढ़ वर्षों में इन्होंने कोरोना से संबंधित अनेक प्रोग्राम तैयार किए हैं। इसमें ‘कोरोना संग्राम सेनानी’ सीरीज में जहां उन्होंने कोरोना वारियर्स के इंटरव्यू किए, वहीं ‘वर्क फ्राम एक्सपर्ट डाक्टर्स अवेयरनेस कैंपेन’ के तहत कोविड के कारण उपजी मानसिक एवं भावनात्मक समस्याओं को लेकर डाक्टरों से बात की। इसके अलावा, भोपाल म्यूनिसिपल कारपोरेशन के साथ मिलकर स्वच्छता संबंधी अभियान भी चलाया।
बताते हैं प्रणव,
‘पूरे लाकडाउन के दौरान हमने स्मार्टफोन के साथ काम किया। हमारी पूरी कोशिश रही कि लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाएं। साथ ही, इस बात पर जोर दिया कि लोग बदले हालात में कैसे जीवन को सकारात्मक तरीके से जीएं। लाइव फोन इन कार्यक्रम में श्रोताओं ने हमें बताया भी कि कैसे उन्होंने मुश्किल दौर का सामना किया और उससे बाहर निकले। अपनी बात करूं तो इस महामारी के दौर में कैंपस रेडियो ने मुझे भी एक नई पहचान दी है। काफी कुछ सीखने को मिला है। आत्मविश्वास आया है।'
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आरजे में लोगों को मिला दोस्त
रेडियो पर नकारात्मक खबरें एवं सूचनाएं प्रसारित नहीं की जातीं। हम समाज में पाजिटिव संदेश पहुंचाने में विश्वास करते हैं। क्योंकि यहां आम लोगों से जुड़ी समस्याओं एवं मुद्दों को उनकी जुबानी ही सबके सामने लाने का प्रयास होता है, इसलिए वे रेडियो पर भरोसा करते हैं। आरजे में तो लोग अपना दोस्त तक ढूंढ़ने लगते हैं। इससे एक समानता की भावना उत्पन्न होती है। कोरोना काल में जब हमने यूनिसेफ के साथ मिलकर ‘आडियो लेटर्स’ नाम से प्रोग्राम शुरू किया तो उसका काफी अच्छा रिस्पांस मिला। इसके अब तक दो सीजन हो चुके हैं। इस शो में हम ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों एवं लोगों से बातचीत करते हैं। क्योंकि उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है। वैसे आज यह समाज की बड़ी समस्या बन चुकी है। इसलिए रेडियो और आरजे उन्हें अपनेपन का एहसास कराते हैं।
आरजे प्रणव
‘लेकसिटी वायस’, भोपाल
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कम्युनिटी रेडियो पर जमीन से जुड़े मुद्दे
तमाम मुश्किलों के बीच कम्युनिटी रेडियो की भागीदारी निश्चित तौर पर बढ़ी है। क्योंकि हम समुदाय के लोगों के मुद्दों को उठाते हैं। कम शब्दों में और एक निर्धारित समयसीमा के अंदर हमें अपनी बात रखनी होती है। इसलिए पूरे रिसर्च एवं होमवर्क के बाद ही कोई प्रोग्राम तैयार किया जाता है। हमारे रिपोर्टर्स सीधे समुदाय के बीच जाते हैं। लोगों से बातें करते हैं और फिर उन्हें प्रसारित किया जाता है। कोरोना काल में भी हमने जिम्मेदारी के साथ काम किया। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान लाकडाउन में जिस तरह लोग घरों में बंद हो गए थे, उससे अनेक प्रकार की मानसिक समस्याएं उत्पन्न हुईं। डाक्टरों की मदद से हम सभी को जागरूक करने की कोशिश करते हैं। कुपोषण को देखते हुए पौष्टिक खानपान पर चर्चा होती है। ‘घर में क्यारी, सेहत प्यारी’ शो के जरिये बताते हैं कि कैसे घर में ही सब्जियां उगायी जा सकती हैं। हमारे ‘कोरोना से जंग, सावधानी के संग’ शो को भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। सबसे अच्छा रिस्पांस तो लाइव फोन इन कार्यक्रम को मिलता है, जिसमें श्रोता सीधे हमसे जुड़ते हैं।
सुजाता कुशवाहा
आरजे, ‘वक्त की आवाज’, कानपुर
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भ्रांतियों को दूर कर जगायी उम्मीद
आज जिस तेजी से मीडिया का विस्तार हो रहा है, उसके बावजूद सीमित संसाधनों के साथ कार्य करने वाले सामुदायिक रेडियो पर श्रोताओं का विश्वास कायम है। क्योंकि हम सिर्फ सच्ची खबरें एवं जानकारियां ही उन तक पहुंचाते हैं। जैसे कुछ समय पहले तक वैक्सीनेशन को लेकर समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियां थीं। लोगों में इसे लेकर एक डर सा था। लेकिन जब हमने इस पर कार्यक्रम किए तो उनमें जागरूकता आई और टीकाकरण को बढ़ावा भी मिला। इसी प्रकार, हमारे ‘ब्रिलियंट आफ बस्ती’ नामक शो का काफी अच्छा फीडबैक है। इसमें बच्चों के लिए एक क्विज प्रतियोगिता होती है। विजेताओं को स्टूडियो में बुलाया जाता है। इससे उनसे अच्छा संवाद हो पाता है। दूसरी ओर ‘चलो गांव की ओर’ एक ऐसा शो है जिसमें हम गांव में जाकर लोगों से उनकी समस्याओं एवं मुद्दों के बारे में जानते हैं और वहीं पर उनकी पूरी रिकार्डिंग भी की जाती है। लोग जब इसे सुनते हैं तो उनका रेडियो के प्रति विश्वास बढ़ता है।
आरजे ऋषभ
‘किसान रेडियो’, बस्ती
क्यों मनाते हैं विश्व रेडियो दिवस
वर्ष 2010 में स्पेन रेडियो एकेडमी ने पहली बार रेडियो दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 3 नवंबर, 2011 को यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा की। 1946 में इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘यूएन रेडियो’ की भी स्थापना हुई थी। इस कारण भी प्रतिवर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाने लगा। इस बार की थीम है-‘रेडियो और विश्वास।‘
