[विकास शर्मा]। दिव्यांग यानी विभिन्न दिव्यताओं को दर्शाता एक स्वरूप, शरीर में एक अयोग्यता के साथ अनेक विशेष योग्यताओं का समावेश जिनमें अद्भुत क्षमताएं होती हैं जिनके सैकड़ों उदाहरण सहज उल्लेखित हैं। समाज के अन्य वर्गों की तुलना में सरकार और राजनीति से कहीं अधिक अपेक्षाकृत बहुसंख्यक पीड़ित दिव्यांग वर्ग सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी की बाट सदियों से जोह रहा है। आजादी के बाद देश में संविधान सभा द्वारा भारतीय कानून को अधिसूचित करने के बाद जहां सरकार ने अपना कार्य करना प्रारंभ कर दिया वहीं दूसरी ओर देश की एक बड़ी आबादी वाला ‘नि:शक्त जन’ तब भी संसदीय दृष्टि से वंचित रह गया और वही स्थिति कमोबेश आज भी बनी हुई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब हमें एक नए सम्मानजनक शब्द ‘दिव्यांग’ के संबोधन से अलंकृत कर हमारी मौजूदगी का आभास करा सकते हैं तो हमें कानूनी अधिकारों से भी अभिसिंचित कर हमारे सर्व धर्म एवं जातीय युक्त दिव्यांग वर्ग के प्रति अपना सकारात्मक संदेश देते हुए राजनीतिक भागीदारी क्यों नही दे सकते हैं? जब यह सरकार बहुप्रतिक्षित दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम-2016 को भारतीय सदन से पास करा सकती है तो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दिव्यांग जनों को राजनीतिक भागीदारी के अंतर्गत सभी सदनों में अन्य आरक्षण प्राप्त करने वाले वर्गों की भांति ‘राजनीतिक भागीदारी’ क्यों नहीं तय करतीं?

यदि अतीत की बात करें तो जब दुनिया के तत्कालीन दिव्यांगों के विभिन्न कानूनों के बनिस्पत भारत में उनके लिए कोई भी कानून नहीं था, तो एक लंबे अंतराल के पश्चात दिव्यांगों की विभिन्न मांगों, आंदोलनों के उपरांत 1980 से 1990 के दशक के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में हुए आंदोलनों के कई वर्षों बाद भारतीय संसद ने नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम-1995 (पीडब्लूडी एक्ट-1995) को 12 दिसंबर 1995 को पारित कर दिया और फिर सात फरवरी 1996 को अधिसूचित किया।

संक्षेप में कहें तो संसदीय न्याय से एक लंबे समय तक वंचित रहने के बाद देश के नि:शक्तजनों को एक पहला कानून (अधिकार) मिला जिसमें काफी कुछ समायोजन का प्रयास किया गया, किंतु इसमें भी बहुत कुछ सम्मिलित होने से वंचित रह गया। इसे शाब्दिक व्याख्यान का अभाव कहें या किसी भी नवसृजित कानून के क्रियान्वयन के उपरांत ही उसके वास्तविक प्रभावों का ज्ञान होना कहा जाए।

समय की मांग एवं दिव्यांगों की विभिन्न श्रेणियों (नेत्रहीन, दृष्टि बाधित, मूक बधिर, अस्ति, मानसिक आदि) की आवश्यकताओं के अनुसार जब इस कानून को दिव्यांगों के अंतरराष्ट्रीय कानूनों के समतुल्य बनाने में पीडब्लूडी एक्ट-1995 में संशोधन करने, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों, सरकार की विभिन्न अधिसूचनाओं व आदेशों को वर्ष 2007 में हुई भारत सरकार एवं संयुक्त राष्ट्र के बीच देश के दिव्यांगों को सामाजिक न्याय एवं राजनीतिक भागीदारी के साथ उच्च स्तरीय अधिकार प्रदान कराने को लेकर की गई संधि को क्रियान्वित कराकर कानून में समायोजन कराने की आवाज, एक नया सशक्त कानून बनाने की मांग देश भर से उठने लगी।

भारत सरकार की दिव्यांगों के प्रति भारी उदासीनता, लापरवाही के चलते समयसीमा निकल जाने के कारण यह ‘संधि’ बिना लागू हुए ही लेप्स हो गई, पर देश के विभिन्न संगठनों द्वारा विभिन्न आंदोलनों के उपरांत भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वर्ष 2011 में एक नवसृजित कानून ‘विकलांग अधिकार विधेयक’ का प्रारूप तैयार किया गया। इस पर देश भर के संबंधित लोगों, संस्थानों से सुझाव तो मांगे गए, परंतु मंत्रालय द्वारा उसे अपने अनुसार ही तैयार किया गया और उसे भी संसदीय उपेक्षा के चलते संसद में रखने से टाला जाता रहा। तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने वर्ष 2014 में इस विधेयक को अध्यादेश के माध्यम से विधेयक की विसंगतियों को सुधारते हुए लागू कराने का आश्वासन दिया जो नहीं हो सका।

आखिरकार राज्यसभा में लाए गए इस विधेयक में विकलांगों के आरक्षण को तीन प्रतिशत से बढ़ा कर पांच प्रतिशत करने, सामाजिक सुरक्षा को सशक्त बनाने, सरकारी एवं निजी क्षेत्र के दिव्यांग कर्मियों की मागों पर गंभीरता से विचार करने आदि महत्वपूर्ण बिंदु शामिल थे। साथ ही पूर्ववर्ती मांगों के अनुसार सुझावों को संसदीय शोध, परीक्षण हेतु इसे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से संबंधित डॉ. रमेश बैस की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति और बाद में मंत्रिमंडल समूह को सौप दिया गया था। विभिन्न व्यक्तियों, संगठनों ने अपने सुझावों, विचारों, सर्वोच्च न्यायालय आदि संवैधानिक संस्थाओं की टिप्पणियों से भी संसदीय स्थायी समिति को अवगत कराया गया।

समिति की मई 2015 में सदन के पटल पर रखी गई रिपोर्ट (सिफारिशों) ने देश भर के दिव्यांग जनों, प्रतिनिधियों, संगठनों को आश्चर्यचकित कर दिया जिसमें दिव्यांगों के अनुरोधों, रोजगार की दशा सुधारने, राजनीतिक भागीदारी एवं विधि आदि के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संवैधानिक संस्थाओं में दिव्यांगों का सुनिश्चित प्रतिनिधित्व जैसी अनेक मांगें अभी भी विधेयक से वंचित हैं। या कहें कि विधेयक को उलझाने के लिए ‘विकलांगता की परिभाषा’ को बदलने का प्रयास करते हुए 21 प्रकार की विभिन्न बीमारियों के मरीजों को अपंगता का दर्जा देने की सिफारिशें की गई जो कि अप्रासंगिक थी।

बावजूद इसके भारतीय संसद ने दिसंबर 2016 में इसे पारित किया तथा बाद में राष्ट्रपति ने इस कानून को जनवरी 2017 को अधिसूचित किया। लेकिन ‘राजनीतिक भागीदारी’ और ‘राष्ट्रीय दिव्यांग आयोग’ की पूर्ववर्ती मांग इस नए कानून से भी वंचित रही। शायद अब तक देश के कुल आबादी का लगभग 10 फीसद हिस्से वाली दिव्यांग जनों की ‘तादाद’ अभी राजनीतिक दृष्टिकोण से संगठित होकर अपने जनादेश को सरकार या राजनीति तक पहुंचाने में नाकामयाब रही हैं। शायद अब देश के करोड़ों दिव्यांग मतदाताओं को अपने परिजनों, ईष्ट मित्रों आदि के साथ मिलकर अपनी राजनीतिक शक्ति का आभास कराने के लिए अपनी वोट बैंक की ताकत को एकत्र कर नया ताना-बाना पेश करना पड़ेगा। हमें आशा है कि संसद और राजनीति हमारी उम्मीदों को पूर्ण करने में योगदान देगी!

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं) 

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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