नई दिल्‍ली, अंशु सिंह। साल 2014 की बात है। भिलाई की समृद्धि साहू गंभीर अवसाद की शिकार हो गई थीं। लेकिन कंप्यूटर साइंस में इंजीनियर समृद्धि ने हार नहीं मानी और खुद ही इससे बाहर निकलने का फैसला किया। उन्होंने पहले से ही मंडल आर्ट के बारे में सुन रखा था, तो बिना देर किये इसे सीखना शुरू कर दिया। वह कहती हैं कि ज्यामितीय आकारों से ब्रह्मांड को जोड़ने की यह अद्भुत कला है, जो अंतर्मन की सारी दुविधाओं को दूर कर देती है। मंडल का मतलब ही होता है पूर्ण घेरा। यह एक तरह की ध्यान प्रक्रिया है, जो आपका स्वयं आपसे परिचय कराती है। आज समृद्धि अपने सहयोगी कलाकारों के साथ मिलकर ‘स्कॉड आर्टिस्ट’ नाम से एक संगठन चलाती हैं। वह मानती हैं कि कला से हम एक बेहतर इंसान बनते हैं। जीवन में रचनात्मकता आती है। ग्रेटर नोएडा स्थित डीपीएस की नौवीं की छात्रा नंदिनी जैन भी कला में खास रुचि रखती हैं।

ऐसे मनाते हैं विश्व रचनात्मकता एवं नवाचार दिवस: हर साल 21 अप्रैल को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ (यूएनओ) की ओर से रचनात्‍मकता एवं नवाचार को समर्पित किया गया है। इस दिवस का उद्देश्‍य विश्‍व भर में रचनात्‍मकता की संस्कृति को बनाए रखना है। इस संगठन का मानना है कि रचनात्‍मकता ही विश्‍व की सबसे अनमोल निधि है, जिसके सहारे हम अपनी सतत विकास की रफ्तार को बनाए रख सकते हैं। हिंसा और वैमनस्‍य के दौर में रचनात्‍मकता ही है जो विश्‍व को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती है। वैसे, विश्व रचनात्मकता एवं नवाचार दिवस (वर्ल्ड क्रिएटिविटी एवं इनोवेशन डे) की शुरुआत 25 मई, 2001 को कनाडा के टोरंटो से हुई थी। इस दिन के संस्थापक कनाडाई मार्सी सेगल थे। सेगल ने 1977 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्टडीज़ इन क्रिएटिविटी में रचनात्मकता का अध्ययन किया था। बाद में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर में सभी मुद्दों के समस्या-समाधान में रचनात्मकता के उपयोग के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए विश्व रचनात्मकता और नवाचार दिवस को मनाए जाने के प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से 27 अप्रैल, 2017 को अपनाया और इस दिवस के लिए हर साल 21 अप्रैल की तिथि तय की।

कोरोना काल में जब स्कूल की ऑनलाइन क्लासेज शुरू हुईं, तो उनके पास काफी समय बचता था, जिसका उन्होंने सदुपयोग करने का फैसला किया। स्केचिंग एवं ऑयल पेंटिंग करते रहने के कारण नंदिनी ने इंटरनेट की मदद से मंडल आर्ट सीखा और देखते ही देखते वह खूबसूरत चित्रकारी करने लगीं। उसे वह इंटरनेट मीडिया पर शेयर करतीं, जिससे उनके आर्ट को अच्छी प्रशंसा मिलने लगी। वह बताती हैं, ‘मंडल आर्ट में बारीक पैटर्न को सिमेट्री में बनाया जाता है। हर पैटर्न अंत में एक विशाल गोलाकार का हिस्सा बनता है यानी मंडल का शुरुआती बिंदु और अंतिम पैटर्न गोल होता है। पहले मैं सामान्य जेल पेन से स्केच करती थी। फिर मैंने मंडल आर्ट में उपयोग किये जाने वाले खास प्रकार के ब्रश (फाइन लाइनर्स) मंगाये और उनसे स्केच करना शुरू किया। ब्लैक ऐंड व्हाइट के अलावा रंगीन चित्रकारी करती हूं। इसमें काफी महीन काम करना होता है, जिसमें समय लगता है। हमें धैर्य रखना होता है। लेकिन इससे जो एकाग्रता बढ़ती है, वह हमारी पढ़ाई में भी काम आती है। तनाव नहीं रहता। रिलैक्स महसूस करती हूं।‘ डेक्सेल यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भी पाया गया है कि मंडल आर्ट तनाव एवं बेचैनी दूर करने में कारगर है।

कलाओं में किया पारंगत: कोरे कागज पर रंग भरने हों, उस पर लकीरों से कोई तस्वीर बनानी हो, मिट्टी से किसी वस्तु को आकार देना हो, सुरों को सजाना हो या नृत्य करना हो...। इन विविध कलाओं में एक ऐसी रुहानी ताकत होती है कि इंसान नयी ऊर्जा एवं आत्मबल से भर जाता है। तभी तो गरीबी, अशिक्षा, शोषण एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में रहने वाली बच्चियां भी कला के माध्यम से अपने साथ अन्य का जीवन संवारने में पीछे नहीं रहतीं। स्वयंसेवी संगठन 'प्रोत्साहन' के साथ बतौर यूथ लीडर जुड़ीं सोनी को नृत्य से काफी लगाव है। कहती हैं, ‘जब मैं उदास होती हूं, तो नृत्य करती हूं और सारे गम व तकलीफें भूल जाती हूं। किसी प्रकार का तनाव नहीं रहता। उलटे खूब खुशी मिलती है। इसलिए अन्य बच्चों को भी डांस सिखाने की कोशिश करती हूं। नृत्य के अलावा इन्हें पेंटिंग का भी शौक है।‘ इनका कहना है कि इन सभी कलाओं ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। मेरे व्यक्तित्व एवं जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव आया है। सोनी 11 साल पहले एक स्टूडेंट के तौर पर संगठन से जुड़ी थीं। यहां आकर उन्होंने स्कूल की अधूरी पढ़ाई पूरी की। आज वह इग्नू से ग्रेजुएशन कर रही हैं। सोनी की तरह प्रोत्साहन की अन्य लड़कियों ने भी विभिन्न कलाओं में खुद को पारंगत कर अपने जीवन में खुशियों के रंग भरे हैं। इससे उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है।

कला व कलाकारों के संरक्षण की कोशिश: दोस्तो, भारत की विविध एवं विशाल संस्कृति को जानना आसान नहीं है। इसके कोने-कोने में कला साधक बसे हुए हैं। लेकिन बीतते समय के साथ उनकी कला या हुनर दम तोड़ रहे हैं। आर्थिक कारणों से उन्हें उसे छोड़ना पड़ रहा है। ऐसे ही कलाकारों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से बेंगलुरु की श्रुति ने ‘कलानेशन’ नाम से एक प्लेटफॉर्म की नींव रखी है। उनका कहना है कि इससे वे कला को जीवित रख सकेंगी। लोग उनके बारे में जान सकेंगे। आज इस मंच से म्यूजिक (वोकल एवं इंस्ट्रूमेंटल) एवं अन्य विधाओं के कलाकार जुड़े हैं। श्रुति की मानें, तो जब हमने इस अभियान की शुरुआत की थी, तो हमें एहसास हुआ कि कैसे बच्चे हमारे मिशन का अभिन्न हिस्सा और भविष्य हो सकते हैं। इसलिए हमने ‘रुनझुन’ नाम से एक पहल की है, जिसमें बच्चों को भारतीय संगीत एवं भारतीय वाद्ययंत्रों के बारे में बताया जाता है। क्योंकि बच्चों में जितनी जल्दी संगीत की समझ पैदा होती है, उससे उनकी स्मरण शक्ति बढ़ती है। वे क्रिएटिव होते हैं, सिमेट्री के पैटर्न की समझ विकसित होती है। इससे वे गणित एवं अन्य विषयों को भी बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। 'परवरिश' स्कूल की सह-संस्थापक एवं कला प्रेमी शिबानी घोष कहती हैं कि हम भी आर्ट एवं क्राफ्ट की मदद से बच्चों की क्रिएटिविटी को पंख देने की कोशिश करते हैं। जैसे हमने उनके लिए महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वर्ली आर्ट की कार्यशाला आयोजित की। बच्चों ने उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पूरे धैर्य एवं तन्मयता से कपड़ों पर चित्रकारी की। इससे उन्हें वर्ली कला के बारे में विस्तार से जानने का मौका भी मिला।

हेरिटेज वॉक कराता है विरासतों से परिचय: दिल्ली कारवां के संस्थापक आसिफ खान बताते हैं कि कई बार किसी पौराणिक स्थल के करीब रहने के बावजूद हमें ही उसके अस्तित्व या इतिहास की पूर्ण जानकारी नहीं होती। उसकी महत्ता का पता नहीं होता। क्योंकि आज भी ज्यादातर हेरिटेज साइट के बारे में ऑनलाइन जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए हम हेरिटेज वॉक के जरिये लोगों को ऐतिहासिक विरासतों से रूबरू कराते हैं। स्टोरीटेलिंग सेशन में उन्हें पौराणिक किस्से एवं कहानियां सुनाते हैं। हमारे वॉक में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई शामिल होता है। इन दिनों हम डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, डिजिटल एंपावरमेंट फाउंडेशन ने भी ‘ई-हेरिटज’ नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसके अंतर्गत वे स्थानीय समुदाय की मदद से किसी खास ऐतिहासिक स्थल का ब्योरा इकट्ठा करेंगे। स्थानीय लोगों की मदद से ही उसे संरक्षित करने की कोशिश करेंगे। इस समय फाउंडेशन ने शाहजहांबाद एवं चंदेरी नाम से दो पायलट वेबसाइट लॉन्च किये हैं, जिसमें दोनों क्षेत्रों के विरासतों की जानकारी दी जाएगी।

मधुबनी पेंटिंग सीखने का सपना हुआ पूरा: मधुबनी पेंटिंग आर्टिस्ट एवं फैशन डिजाइनर दिक्षिता सिंह ने बताया कि मैंने निफ्ट (कोलकाता) से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया है। मधुबनी पेंटिंग सीखने की हमेशा से ख्वाहिश थी। इसे आगे लेकर जाना चाहती थी। जिस तरह सब्यशाची पश्चिम बंगाल के काथा आर्ट को शोकेस करते हैं, मैं भी मधुबनी पेंटिंग को अपने डिजाइन में शामिल करना चाहती हूं। बीते साल लाकडाउन के दौरान मैंने इसे मधुबनी पेंटिंग की प्रतिष्ठित आर्टिस्ट प्रीति कर्ण से ऑनलाइन सीखना शुरू किया। उन्होंने मुझे इस कला की बारीकियों, इसके तकनीकी पहलुओं, इसके चित्रों के असल अर्थ से वाकिफ कराया है। उनकी गाइडेंस में पिछले एक साल में मैंने कपड़े, साड़ी, कागज जैसे अनेक माध्यमों में पेंटिंग की है। उन्होंने मुझे पूरी क्रिएटिव फ्रीडम दी है। जैसे, मधुबनी पेंटिंग में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन मैं एक्रिलिक या फैब्रिक रंगों से यह करती हूं। हालांकि मुझे मालूम है कि कैसे सिंदूर, कुमकुम, हल्दी या पत्तों से प्राकृतिक रंग तैयार किये जाते हैं। कैसे घंटों मिट्टी एवं पानी में भिगोने के बाद मधुबनी के पारंपरिक पेपर बनाये जाते हैं। यह सब मैंने सीखा है। मैं चाहती हूं कि आगे चलकर नयी पीढ़ी को प्रशिक्षित कर सकूं। इस कला को सीखने का एक उद्देश्य यह भी है।

शास्त्रीय संगीत का दर्जा है काफी ऊंचा: हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक एवं म्यूजिक कंपोजर सप्तक चटर्जी ने बताया कि मेरे पिता जी पंडित सारथी चटर्जी और दादा जी अरुण कुमार चटर्जी दोनों ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक रहे हैं। बचपन से उन्हें सुनता आया हूं, इसलिए इसमें रुचि विकसित हुई। मैंने छोटी उम्र से ही दोनों से विधिवत शिक्षा लेनी भी शुरू कर दी। आगे चलकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई एकल परफॉर्मेंस दिया। पिता जी के साथ ड्यूट कंसर्ट किया। लेकिन मैंने स्वयं को सिर्फ शास्त्रीय गायन तक सीमित नहीं रखा। ऑडियो इंजीनियरिंग एवं म्यूजिक प्रोडक्शन में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के कारण फिल्मों, वेब सीरीज, टेलीविजन, एडवर्टिजमेंट के लिए संगीत, बैकग्राउंड स्कोर बनाता हूं। म्यूजिक कंपोज करता हूं। मेरी कोशिश रहती है कि अलग-अलग मीडियम्स को जानूं। कोरोना काल में मैंने कई डिजिटल कंसर्ट्स किये। उनका एक अलग अनुभव रहा। दरअसल, पहले की अपेक्षा आज युवाओं के पास विकल्पों की कमी नहीं। वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत या कंटेम्पररी म्यूजिक में दक्ष होकर भी अपना सुनहरा भविष्य बना सकते हैं। च्वाइस उनकी अपनी होनी चाहिए। मैंने यही देखा है कि तमाम आधुनिकता एवं वैश्वीकरण के बावजूद देश में शास्त्रीय संगीत को पूरा सम्मान दिया जाता है। उसका दर्जा काफी ऊंचा है।

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