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संसद ही नहीं, सरकारी कंपनियों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी कम; सिर्फ 9.8% महिला कर्मचारी

Published: Sun, 06 Sep 2026 08:30 PM (IST)

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (सीपीएसई) में महिलाओं की भागीदारी वित्त वर्ष 2024-25 में घटकर मात्र 9.8% रह गई है, जो बेहद चिंताजनक है।

सरकारी कंपनियों में महिलाओं की घटती हिस्सेदारी चुनौतियां और समाधान (AI फोटो)

सरकारी कंपनियों में महिलाओं की घटती हिस्सेदारी चुनौतियां और समाधान (AI फोटो)

HighLights

  1. सीपीएसई में महिला कर्मचारियों की हिस्सेदारी घटकर 9.8% हुई।

  2. कार्य परिस्थितियाँ, सीमित अवसर महिलाओं की कम भागीदारी का कारण।

  3. सुरक्षित कार्यस्थल, चाइल्डकेयर, लैंगिक संतुलन पर जोर दिया गया।

पीटीआई, नई दिल्ली। संसद और विधानसभाओं में भले ही महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिए जाने में हीला-हवाली के लिए आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर जारी हो, लेकिन सार्वजनिक उपक्रमों में भी महिलाओं की भागीदारी का अनुपात बेहद खराब है।

सरकार के हालिया आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (सीपीएसई) के कुल कर्मचारियों में महिलाओं की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2024-25 के अंत में महज 9.8 प्रतिशत थी। इतना ही नहीं, इन संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं के बीच भी नेतृत्व और सुपरवाइजरी पदों पर पहुंचने का अंतर साफ दिखाई देता है।

पब्लिक एंटरप्राइजेज सर्वे के मुताबिक, 2023-24 में सीपीएसई में महिला कर्मचारियों की संख्या 77,625 थी, जो 2024-25 में घटकर 76,685 रह गई। कुल महिला कर्मचारियों में 32.4 प्रतिशत मैनेजर या एग्जीक्यूटिव स्तर पर थीं, जबकि केवल 8.7 प्रतिशत सुपरवाइजरी पदों पर और 58.9 प्रतिशत वर्कर श्रेणी में थीं।

सुपरवाइजरी स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी भी 2022-23 के 10.08 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में करीब 9 प्रतिशत हो गई। देश में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 2024-25 में 40 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत पर आ गई।

विशेषज्ञों के मुताबिक, सीपीएसई में महिलाओं की कम भागीदारी का कारण केवल भर्ती नहीं, बल्कि काम की परिस्थितियां और करियर में आगे बढ़ने के सीमित अवसर भी हैं। कई सार्वजनिक उपक्रम खनन, कोयला, पेट्रोलियम, स्टील, भारी इंजीनियरिंग, बिजली, परिवहन और निर्माण जैसे पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में हैं।

दूरदराज के इलाकों में पोस्टिंग, कठिन शिफ्ट, सुरक्षित परिवहन और चाइल्डकेयर जैसी सुविधाओं की कमी महिलाओं के लिए बड़ी बाधा बन सकती है।

वाईएसआर कांग्रेस की सांसद डॉ. गुम्मा थनुजा रानी ने पीएसयू में महिलाओं की भर्ती के लिए स्पष्ट और समयबद्ध लक्ष्य तय करने तथा खनन और औद्योगिक उपक्रमों में क्रेच, हॉस्टल, सुरक्षित परिवहन और लचीली पोस्टिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत बताई।

उन्होंने चयन और प्रमोशन बोर्ड में लैंगिक संतुलन तथा करियर ब्रेक के बाद महिलाओं की वापसी के लिए पेड री-एंट्री कार्यक्रम की वकालत की।

पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने कहा कि महिलाओं की कम भागीदारी को केवल उनकी काम करने की इच्छा से नहीं जोड़ा जा सकता। देखभाल की जिम्मेदारियां, घर के काम में पुरुषों की कम भागीदारी, सुरक्षित आवागमन, स्किल ट्रेनिंग और महिलाओं के आसपास रोजगार के सीमित अवसर भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने सस्ती चाइल्डकेयर, सुरक्षित और लचीले कार्यस्थल, बेहतर प्रशिक्षण तथा निष्पक्ष भर्ती और प्रमोशन व्यवस्था पर जोर दिया।विधायिका में भले ही महिलाओं को आरक्षण पर बहस जारी हो, लेकिन लोकसभा में उनकी भागीदारी पांच प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। इसके अलावा, किसी भी विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 प्रतिशत भी नहीं है।

हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो महज एक महिला विधायक है।

जेंडर विशेषज्ञों के अनुसार, बदलाव का मतलब केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें भर्ती, प्रशिक्षण, प्रमोशन और नेतृत्व तक समान अवसर देना भी है। इसके लिए सुरक्षित कार्यस्थल, सामाजिक सुरक्षा और ऐसा माहौल जरूरी है जहां लैंगिक पूर्वाग्रह और भेदभाव की गुंजाइश न हो।