बिलासपुर, जेएनएन। बेरोजगारी का दंश झेल रहे छत्तीसगढ़ के 45 हजार वकीलों में रोजगार की उम्मीद जगी है। इसका आधार गुजरात उच्च न्यायालय का वह फैसला बना है, जिसमें वकीलों को अन्य व्यवसाय की छूट दे दी गई है। वहां के वकीलों ने लॉकडाउन के कारण न्यायालय बंद होने से आर्थिक संकट का हवाला देते हुए इसकी अनुमति मांगी थी। छत्तीसगढ़ में भी वकीलों ने याचिका दायर कर आर्थिक मदद की गुहार लगाई है, जिसमें उच्च न्यायालय ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के कारण देशभर के उच्च न्यायालय समेत अधीनस्थ न्यायालयों में कामकाज प्रभावित है। ऐसे में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में लॉकडाउन के तीसरे चरण के दौरान वकील राजेश केशरवानी ने अपने वकील संदीप दुबे के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें न्यायालयों के बंद होने से वकीलों के सामने आर्थिक संकट खड़ा होने की जानकारी देते हुए आर्थिक मदद की गुहार लगाई गई।

याचिकाकर्ता ने कोरोना संक्रमण के मौजूदा दौर में लाइसेंसी वकीलों को अन्य व्यवसाय करने छूट देने की मांग की थी। चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन व जस्टिस पीपी साहू की डिवीजन बेंच ने स्टेट बार कौंसिल के अलावा बार कौंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआइ) को नोटिस जारी कर इस संबंध में जवाब तलब किया था। तब बीसीआइ ने वकीलों को आर्थिक मदद देने के लिए स्टेट बार को 48 लाख रपये जारी किए थे, जिससे जरूरतमंद वकीलों के बैंक खाते में तीन-तीन हजार पये जमा कराए गए। अब अन्य व्यवसाय को लेकर भी गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले से वकीलों में नई उम्मीद जगी है।

यह है नियम

बीसीआइ के अधिनियम 1969 के अनुसार वकालत करने के लिए लाइसेंस हासिल करने वाले वकीलों को वकालत के अलावा अन्य व्यवसाय की अनुमति नहीं मिलेगी। नियमों से लाइसेंसधारी वकील बंधे रहेंगे।

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