नई दिल्‍ली (जेएनएन)। उदारीकरण शुरुआत 30 साल पहले हो गई थी, लेकिन कृषि उत्पाद बाजार आज भी इसकी बाट जोह रहे हैं। किसान आज भी अपनी मर्जी से अपने उत्पाद नहीं बेच सकते। आइए जानते हैं मौजूदा कृषि कानूनों के प्रावधान, उनसे किसानों को होने वाले लाभ व विरोध के कारणों को....

कौन और क्यों कर रहा विरोध

किसान: उनका मानना है कि नए कानूनों से एमएसपी प्रणाली खत्म हो जाएगी। किसान वैधानिक गारंटी चाहते हैं।

कमीशन एजेंट: क्योंकि उनका एकाधिकार और बंधा हुआ मुनाफा खत्म हो जाएगा।

राज्य सरकारें: उन्हें मंडी शुल्क के रूप में मोटा राजस्व प्राप्त होता है। खासकर पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में।

राजनीतिक दल: राज्यों में सत्तारूढ़ दल मंडी शुल्क नहीं खोना चाहते हैं। दूसरी तरफ, कमीशन एजेंट प्रायोजित तरीके से सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के नेताओं से प्रदर्शन करवा रहे हैं।

1 मुक्त बाजार

कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य कानून-2020 राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद अब कानून बन चुका है। अब किसान देश के किसी भी हिस्से में अपना उत्पाद बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। इससे पहले की फसल खरीद प्रणाली उनके प्रतिकूल थी।

किसानों को ऐसे होता है नुकसान

  • इच्छा के अनुरूप उत्पाद को बेचने के लिए आजाद नहीं है।
  • भंडारण की व्यवस्था नहीं है, इसलिए वे कीमत अच्छी होने का इंतजार नहीं कर सकते।
  • खरीद में देरी पर एमएसपी से काफी कम कीमत पर फसलों को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
  • कमीशन एजेंट किसानों को खेती व निजी जरूरतों के लिए रुपये उधार देते हैं। औसतन हर एजेंट के साथ 50-100 किसान जुड़े होते हैं।
  • अक्सर एजेंट बहुत कम कीमत पर फसल खरीदकर उसका भंडारण कर लेते हैं और अगले सीजन में उसकी एमएसपी पर बिक्री करते हैं।
  • नए कानून से किसानों को ऐसे होगा लाभ अपने लिए बाजार का चुनाव कर सकते हैं।
  • अपने या दूसरे राज्य में स्थित कोल्ड स्टोर, भंडारण गृह या
  • प्रसंस्करण इकाइयों को कृषि उत्पाद बेच सकते हैं।
  • फसलों की सीधी बिक्री से एजेंट को कमीशन नहीं देना होगा।
  • न तो परिवहन शुल्क देना होगा न ही सेस या लेवी देनी होगी।
  • इसके बाद मंडियों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी होना होगा।

मौजूदा फसल खरीद प्रणाली

  • फिलहाल किसान राज्य सरकार की कृषि उत्पाद बाजार समितियों (एपीएमसी) यानी मंडियों में अपने उत्पाद बेचते हैं।
  • मंडियों में किसान अपने उत्पाद अधिकृत कमीशन एजेंट के माध्यम से बेचने के लिए मजबूर होते हैं। पंजाब व हरियाणा में इन्हें आढ़ती कहा जाता है। सिर्फ बिहार, केरल, मणिपुर, लक्षद्वीप, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा दमन एवं दीव में मंडियां नहीं हैं।
  • मंडियों में कमीशन एजेंट किसानों से उत्पाद बिक्री से मिलने वाली कुल रकम में से 1.5-3 फीसद की कटौती कर लेते हैं। एजेंट यह कटौती उत्पाद की सफाई, छंटाई व अनाज का ठेका आदि के नाम पर करते हैं। मंडियां एजेंटों से फीस वसूलती हैं।
  • एफसीआइ समेत अन्य सरकारी एजेंसियां 60-90 दिनों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के आधार पर किसानों से फसलों की खरीद करती हैं। हालांकि, इस दौरान फसलों की गुणवत्ता भी देखी जाती है। इसके बाद व्यापारी बाजार मूल्य के अनुरूप किसानों से फसलों की खरीद करते हैं।

2 अनुबंध कृषि

मूल्य आश्वासन व कृषि सेवा कानून-2020 के कानून बनने के बाद किसान अनुबंध के आधार पर खेती के लिए आजाद हो जाएंगे।

क्यों हो रहा विरोध

  • किसानों का कहना है कि फसल की कीमत तय करने व विवाद की स्थिति का बड़ी कंपनियां लाभ उठाने का प्रयास करेंगी।
  • बड़ी कंपनियां छोटे किसानों के साथ समझौता नहीं करेंगी। अनुबंध कृषि की मौजूदा स्थिति
  • मौजूदा अनुबंध कृषि का स्वरूप अलिखित है। फिलहाल निर्यात होने लायक आलू, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी व फूलों के उत्पादन के लिए ही अनुबंध किया जाता है।
  • कुछ राज्यों ने मौजूदा कृषि कानून के तहत अनुबंध कृषि के लिए नियम बनाए हैं।

सरकार का पक्ष

  • कीमत तय करने में किसानों की बराबर भूमिका होगी। वे अपना समझौता कभी भी तोड़ सकते हैं और इसके लिए उन्हें जुर्माना भी अदा नहीं करना होगा। जबकि, बड़ी कंपनियों को फसल की तय कीमत का भुगतान करना होगा और ऐसा न करने पर उन्हें जुर्माना अदा करना होगा।
  • समझौते के तीन दिनों के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा।
  • 10 हजार से भी ज्यादा कृषि उत्पाद संगठन छोटे किसानों को कंपनियों के साथ समझौते के लिए सक्षम बनाएंगे।
  • स्थानीय स्तर के विवाद का नियम के अनुरूप समाधान किया जाएगा। अन्यथा की स्थिति में अदालत के जरिये उसका हल निकाला जाएगा। किसानों को ऐसे होगा फायदा
  • किसान आपसी सहमति के आधार पर फसल की कीमत तय करते हुए उसकी बिक्री के लिए प्रसंस्करण इकाइयों, थोक विक्रेताओं व निर्यातकों आदि से समझौता कर सकते हैं।
  • इसके जरिये किसानों को फसल बोने से पहले उसके न्यूनतम मूल्य की गारंटी मिल जाएगी। इसका मतलब है कि किसानों का जोखिम अब खरीदार उठाएंगे।
  • किसान फसल की बोआई से पहले रणनीति तय कर सकेंगे और उसके अनुरूप बीज, खाद आदि की खरीद कर सकेंगे।
  • बाजार मूल्य अगर ज्यादा हो जाता है तो खरीदारों को उसी के अनुरूप भुगतान करना होगा, चाहे समझौते में उत्पाद की कीमत कम ही क्यों न तय हुई हो। विवाद की स्थिति में तय समय सीमा में उसका निस्तारण किया जाएगा।

3 असीमित भंडारण

  • आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020 के तहत अनाज, दलहन, तिलहन, खाने वाले तेल, प्याज व आलू को आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान है।
  • इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी। क्यों हो रहा विरोध
  • असामान्य स्थितियों के लिए कीमतें इतनी अधिक हैं कि उत्पादों को हासिल करना आम आदमी के बूते में नहीं होगा।
  • आवश्यक खाद्य वस्तुओं के भंडारण की छूट से कॉरपोरेट फसलों की कीमत को कम कर सकते हैं।

ये होंगे लाभ

  • कानून बनने के बाद खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के प्रति बड़ी कंपनियां और विदेशी निवेशक आकर्षित होंगे। इसके जरिये कोल्ड स्टोर व भंडारण गृहों की व्यवस्था दुरुस्त होगी।
  • जब खाद्य आपूर्ति शृंखला दुरुस्त होगी तो कीमतों में भी स्थिरता आएगी।  फसल अच्छी होने की स्थिति में कीमत बहुत कम नहीं होगी और खराब होने की स्थिति में मूल्य आसमान पर नहीं चढ़ेगा।
  • भंडारण की सुविधा अच्छी होने के बाद अनाज की बर्बादी भी कम हो जाएगी।

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