हरिकिशन शर्मा, नई दिल्ली। पिछले हफ्ते कई राज्यों से एटीएम में नकदी न होने की खबरें आईं। सरकार ने कहा कि सिस्टम में नकदी पर्याप्त है जबकि कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि आज हमारी अर्थव्यवस्था का जितना आकार है उस हिसाब से चलन में मुद्रा कम है। अर्थतंत्र में जितने अधिक लेन-देन होते हैं, अर्थव्यवस्था का आकार भी उतना बड़ा होता है। इसके लिए अर्थव्यवस्था में मनी सप्लाई पर्याप्त होना बेहद जरूरी है। मनी सप्लाई का संतुलन बिगड़ने पर अर्थव्यवस्था पर कई कुप्रभाव पड़ते हैं।

-आरबीआइ करता मनी सप्लाई

-'एम1', 'एम2', 'एम3' और 'एम4' के जरिए मनी सप्लाई पर नजर रखता है केंद्रीय बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक मनी सप्लाई करता है और 'एम1', 'एम2', 'एम3' और 'एम4', के जरिए इसके प्रसार व प्रवाह पर नजर रखता है और अपनी मौद्रिक नीति के जरिए इसे नियंत्रित करता है। 'जागरण पाठशाला' में हम मनी सप्लाई से जुड़ी आर्थिक शब्दावली समझने का प्रयास करेंगे।

लेन-देन का सर्वाधिक प्रचलित माध्यम मनी (धन) है। यह करेंसी नोट, सिक्कों, बैंक खाते में जमाराशि सहित अलग-अलग रूपों होता है। करेंसी नोट और सिक्कों को 'फिएट मनी' भी कहते हैं। इन्हें लीगल टेंडर भी कहा जाता है क्योंकि देश में लेन-देन के लिए कोई भी नागरिक इन्हें स्वीकारने से इंकार नहीं कर सकता। इसलिए अर्थव्यवस्था में मनी सप्लाई का संतुलन बेहद जरूरी है। अगर धन आपूर्ति घटती है तो अर्थव्यवस्था में कीमतें नीचे आने लगती हैं, जिसे डिफ्लेशन कहते हैं। लेकिन जब मुद्रा की छपाई ज्यादा होती है और धन की आपूर्ति बढ़ती है तो महंगाई बढ़ने लगती है।

महंगाई बढ़ने से करेंसी का मूल्य घटता जाता है। यही वजह है कि आरबीआइ 'रिजर्व मनी', 'नैरो मनी' और 'ब्रॉड मनी' के रूप में धन को वर्गीकृत कर मनी सप्लाई पर नजर रखता है।

चलन में मुद्रा, आरबीआइ के पास जमा बैंकों की राशि और रिजर्व बैंक के पास जमा अन्य राशियों के कुल योग को 'रिजर्व मनी' कहते हैं। हालांकि आबीआइ सरकार व व्यवसायिक क्षेत्रों को जो धनराशि उधार देती है, उसे इस योग से घटा दिया जाता है। इसी तरह बैंकों पर आरबीआइ के दावे, आरबीआइ की शुद्ध विदेशी परिसंपत्तियां और जनता के प्रति सरकार की करेंसी लाइबिलिटी भी इसमें शामिल नहीं है। इसे हाईपावर्ड मनी भी कहते हैं। यह एक प्रकार से रिजर्व बैंक की कुल मौद्रक लाइबिलिटी होती है। इसीलिए आरबीआइ को इसके लिए सोना-चांदी और सरकारी बांड परिसंपत्ति जुटाकर रखनी होती है।

मसलन, अगर रिजर्व बैंक दस हजार रुपये का सोना खरीदता है तो वह विक्रेता को मुद्रा जारी कर भुगतान कर देता है। इस तरह अर्थव्यवस्था में चलन में दस हजार रुपये की मुद्रा जुड़ जाती है। ये दस हजार रुपये आरबीआइ की बेलेंस शीट में परिसंपत्तियों और लाइबिलिटी के कॉलम में दर्ज हो जाएंगे। इसी तरह रिजर्व बैंक करेंसी जारी कर सरकार के बांड खरीदता है।

नैरो मनी: 'नैरो मनी' के दो पैमाने होते हैं 'एम1' और 'एम2' । 'एम1' में जनता के पास करेंसी, बैंकों के पास डिमांड डिपोजिट यानी बचत और चालू खातों में जमा राशि और आरबीआइ के पास जमा अन्य राशि शामिल हैं। हालांकि इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक के पास भारत की जमाराशियां और इंटर बैंक डिपोजिट शामिल नहीं हैं। 'एम1' में जब डाकघर की जमा बचत राशियों को जोड़ लिया जाता है तो उस योग को 'एम2' कहते हैं।

ब्रॉड मनी: 'ब्रॉड मनी' के भी दो सूचक होते हैं 'एम3' और 'एम4' । इन दोनों को ही ब्रॉड मनी कहते हैं। 'एम3' में 'एम1' और बैंकों के पास जमा टाइम डिपोजिट यानी फिक्स्ड और रिकरिंग डिपोजिट शामिल हैं। 'ब्रॉड मनी' का दूसरा सूचक 'एम4' होता है जिसमें 'एम3' और डाकघरों में जमा सभी तरह के डिपोजिट शामिल हैं। इसमें हालांकि राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) की राशि शामिल नहीं होती। अर्थव्यवस्था में मनी सप्लाई देखने का सबसे प्रचलित तरीका 'एम3' ही है। 'एम1' में नकदी का योगदान सबसेज्ज्यादा होता है जबकि 'एम4' में सबसे कम।

हमारे देश में मुद्रा की आपूर्ति करने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। दो रुपये से लेकर 2000 रुपये तक के नोट की छपाई रिजर्व बैंक करता है। जबकि एक रुपये के नोट और सभी सिक्कों (1,2,5,10) सरकार आरबीआइ के जरिए जारी करती है। अर्थव्यवस्था में कितनी करेंसी की जरूरत है, आरबीआइ इक्नॉमेट्रिक्स विश्लेषण के जरिए यह पता करता है। ऐसा करते समय आरबीआइ जीडीपी में वृद्धि और मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव जैसे कारकों को संज्ञान में लेता है।

 

By Bhupendra Singh