खेती में नैनो क्रांति की दस्तक: खाद से घटेगी आयात निर्भरता, किसानों का भरोसा सबसे बड़ी कसौटी
नैनो उर्वरक भारत में बढ़ते खाद संकट और आयात निर्भरता का स्वदेशी समाधान बन सकता है।

खाद संकट में किसानों का स्वदेशी इलाज (प्रतीकात्मक फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। उर्वरकों के कच्चे माल की बेतहाशा बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आयात लागत कम करने के प्रयासों के बीच नैनो उर्वरक भारत के लिए नया विकल्प बन सकता है।
अभी देश में चार प्लांटों से उत्पादन हो रहा है। प्रत्येक वर्ष 29 करोड़ बोतल निर्माण की क्षमता हासिल कर ली गई है, जो करीब 13.50 लाख टन परंपरागत उर्वरक के बराबर है, लेकिन अभी तक के प्रयासों के बावजूद नैनो तकनीक पारंपरिक उर्वरकों का विकल्प नहीं बन सकी है, जिससे आत्मनिर्भरता की राह अभी लंबी दिख रही है।
नैनो उर्वरक जागरूकता अभियान
ऐसे में किसानों को जागरूक करने के लिए इफको ने पिछले महीने से देशभर में नैनो उर्वरक जागरूकता अभियान शुरू किया है।
केंद्र सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार चालू खरीफ सीजन में 390.54 लाख टन उर्वरकों की जरूरत है। अभी देश में 200.47 लाख टन का स्टाक उपलब्ध है, जो कुल जरूरत का करीब 51 प्रतिशत ही उपलब्ध है।
सामान्य वर्षों में मई-जून तक स्टॉक का स्तर लगभग 33 प्रतिशत रहता है। स्पष्ट है कि अग्रिम भंडारण और प्रबंधन के चलते हम बेहतर स्थिति में हैं।
क्या है नैनो तकनीक?
सच्चाई यह है कि देश को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अभी भी उत्पादन और आयात दोनों का सहारा लेना पड़ रहा है। नैनो उर्वरकों की उपयोगिता यहीं पर सामने आती है।
नैनो तकनीक के कारण पौधे पोषक तत्वों का अधिक कुशलता से उपयोग कर पाते हैं। इससे कम मात्रा में भी अच्छे नतीजे मिलने की संभावना रहती है। मात्र पांच सौ ग्राम की बोतल का असर एक बोरी खाद (45 किलोग्राम) के बराबर रहने के कारण परिवहन, भंडारण एवं वितरण की लागत कम हो जाती है। इससे सरकार के सब्सिडी के बोझ को कम किया जा सकता है।
चालू वित्त वर्ष में एक लाख 70 हजार करोड़ रुपये की खाद सब्सिडी का बजटीय प्रविधान किया गया है, जो बढ़कर करीब तीन लाख करोड़ रुपये हो सकता है।
इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी का कहना है कि नैनो उर्वरक तकनीक कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है। अगर 50 प्रतिशत किसान भी नैनो उत्पादों की ओर बढ़ते हैं तो सब्सिडी पर होने वाला खर्च काफी कम हो सकता है।
साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत, ऊर्जा खपत और आयात निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि नैनो उर्वरकों के सामने कई चुनौतियां हैं।
सबसे बड़ी समस्या है कि यह अभी पारंपरिक यूरिया और डीएपी का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाया है। इसके दो कारण हैं। पहला किसानों में जागरूकता की कमी और दूसरा छिड़काव के लिए कृषि ड्रोन पर निर्भरता। किसानों को अभी भी परंपरागत उर्वरक पर ज्यादा भरोसा है। जिन किसानों ने इसे स्वीकार भी किया है, उनके लिए ड्रोन की सहज उपलब्धता नहीं है। यही कारण है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद नैनो उर्वरकों का हिस्सा देश की कुल उर्वरक खपत के मुकाबले अभी बहुत कम है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नैनो उर्वरक आगामी वर्षों में पारंपरिक उर्वरकों की खपत और आयात निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन फिलहाल उसे खाद संकट का पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता।
किसानों का भरोसा बढ़ाने, व्यापक वैज्ञानिक परीक्षणों और बड़े पैमाने पर उपयोग के बाद ही यह तकनीक भारत को उर्वरक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के करीब पहुंचा सकेगी।
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