नई दिल्‍ली, जेएनएन। यलगार परिषद इन दिनों सुर्खियों में है। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्‍या की साजिश रचने के आरोप के बाद यह जांच एजेंसियों के निशाने पर है। दरअसल, इस मामले में जहां सरकारी पक्ष कानून व्‍यवस्‍था और देश की एकता अंखडता का मसला मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसमें दूर की सियासत कर रहा है। वह इसे दलितों से जोड़ कर इसको राजनीतिक आयाम देना चाहता है। आइए आपको बताते हैं कि यलगार परिषद क्या है और भीमा कोरेगांव से इसका क्या लिंक है।

क्‍या है यलगार परिषद?
जैसा सुनने में लगता है कि यलगार परिषद कोई संस्‍था या संगठन होगा, लेकिन ऐसा है नहीं। दरअसल, यह एक रैली थी। इस रैली का नाम यलगार परिषद था। लेकिन यलगार परिषद के पहले यह समझना जरूरी है कि भीमा कोरेगांव का इससे क्‍या कनेक्‍शन है। दरअसल, भीमा कोरेगांव का लिंक ब्रिटिश हुकूमत से है। यह पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध के लिए जाना जाता है। इस रण में मराठा सेना बुरी तरह से पराजित हुई थी।

इस युद्ध में मराठा सेना का सामना ईस्‍ट इंडिया कंपनी के महार (दलित) रेजीमेंट से था। इसलिए इस जीत का श्रेय महार रेजीमेंट के सैनिकों को जाता है। तब से भीमा कोरेगांव को पेशवाओं पर महारों यानी दलितों की जीत का रण माना जाने लगा। इसे एक स्मारक के तौर पर स्थापित किया गया और हर वर्ष इस जीत का उत्‍सव मनाया जाने लगा। भीमराव आंबेडकर इस जीत के जश्‍न में यहां हर साल आते रहे।

31 दिसंबर 2017 को इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी। 'भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान' के बैनर तले कई संगठनों ने मिलकर एक रैली का अयोजन किया। इसका नाम 'यलगार परिषद' रखा गया। वाड़ा के मैदान पर हुई इस रैली में 'लोकतंत्र, संविधान और देश बचाने' की बात कही गई। दिवंगत छात्र रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला ने इस रैली का उद्घाटन किया था। इस रैली में प्रकाश आंबेडकर, हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल, गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी, जेएनयू छात्र उमर खालिद, आदिवासी एक्टिविस्ट सोनी सोरी आदि मौजूद रहे।

यलगार परिषद की रैली को 300 से ज्‍यादा संगठनों का समर्थन
यह दावा किया जाता है कि यलगार परिषद की रैली को 300 से ज्‍यादा संगठनों ने अपना समर्थन दिया था। ऐसा कहा जाता है कि ये रैली दो पूर्व जजों ने बुलाई थी। यलगार परिषद में बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल और जस्टिस पीबी सावंत का नाम सामने आया। इस रैली के बाद पाटिल ने मुंबई में एक संवाददाता सम्‍मेलन में यह बताया था कि यलगार परिषद को 300 से ज़्यादा संगठनों का समर्थन प्राप्‍त था। जस्टिस पाटिल का कहना है कि इस यलगार परिषद में हमने यहां आए लोगों को यह शपथ दिलाई कि वो किसी सांप्रदायिक पार्टी को कभी वोट नहीं देंगे। हम संघ के इशारों पर चलने वाली भाजपा को वोट नहीं देंगे।

जस्टिस पाटिल का पक्ष
- हमारा माओवादियों से कोई रिश्‍ता नहीं है। यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठा है। गिरफ्तार लोगों से हमारा कोई दूर-दूर तक नाता नहीं है।
- इस रैली के लिए नक्‍सलियों की कोई मदद नहीं ली गई। उनसे किसी तरह का चंदा नहीं लिया गया। रैली में आए लोग भीमा कोरेगांव के उत्सव में शामिल होने पहुंचे थे। हमें वहां पहले से तैयार एक मंच मिला था, जहां हमने कार्यक्रम किया।

हरकत में आई पुलिस, क्‍या है आरोप
एक जनवरी 2018 को पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी। इससे एक दिन पहले वहां यलगार परिषद नाम से एक रैली हुई थी और इसी रैली में हिंसा भड़काने की भूमिका बनाई गई। इसके बाद संसावाड़ी में हिंसा भड़क उठी थी। कुछ क्षेत्रों में पत्थरबाज़ी की घटना हुई। उपद्रव के दौरान एक नौजवान की जान भी गई।

1- पुलिस का दावा है कि यलगार परिषद सिर्फ़ एक मुखौटा था और माओवादी इसे अपनी विचारधारा के प्रसार के लिए इस्तेमाल कर रहे थे।
2- 28 अगस्त को इस सिलसिले में पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवर राव, अरुण फरेरा और वरनॉन गोन्ज़ाल्विस को गिरफ़्तार कर लिया।
3- पुणे पुलिस ने अदालत में कहा कि गिरफ्तार किए गए पांचों लोग प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के सदस्य हैं और यलगार परिषद देश को अस्थिर करने की उनकी कोशिशों का एक हिस्सा था।
4- पुलिस ने सुधीर धवले और कबीर कला मंच के लोगों पर यलगार परिषद में आपत्तिजनक गीत गाने के आरोप लगाए। उन पर भड़काऊ और विभाजनकारी बयान देने और पर्चों व भाषणों के ज़रिये विवाद पैदा करने के आरोप भी लगाए गए।
5- यलगार परिषद से जुड़े दो और मामले पुणे शहर के विश्रामबाग पुलिस थाने में दर्ज किए गए। इसमें जिग्नेश मेवानी और उमर ख़ालिद पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा।

अन्‍य गिरफ्तारी
- इस मामले में दक्षिणपंथी संस्था समस्त हिंद अघाड़ी के नेता मिलिंग एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक संभाजी भिड़े के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया।
- दूसरा मामला तुषार दमगुडे की शिकायत पर यलगार परिषद से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया। इसके तहत जून में सुधीर धवले समेत पांच एक्टिविस्ट गिरफ़्तार किए गए।

Posted By: Ramesh Mishra