खामेनेई की मौत पर चुप्पी, खाड़ी से लगातार संवाद...पश्चिम एशिया को लेकर भारत की क्या है कूटनीति?
US और इजरायल लगातार चौथे दिन ईरान पर हमला कर रहे हैं। ईरान-इजरायल जंग पर भारत ने गहरी चिंता जताई। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जयप्रकाश रंजन, जागरण। ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के 48 घंटे से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन अभी तक भारत की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसी दौरान पीएम नरेन्द्र मोदी ने यूएई, सउदी अरब, बहरीन, इजरायल के शीर्ष नेताओं से टेलीफोन पर बात कर चुके हैं और इन सभी देशों पर हुए हमले पर अपनी चिंता जता चुके हैं।
अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने इन सभी देशों पर हमला किया है। ऐसे में भारत व दुनिया के कूटनीतक गलियारे में एक नई चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भारत का पारंपरिक पश्चिम एशिया संतुलन अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है?
नई प्रैक्टिकल सोच
विदेश मंत्रालय के अधिकारी और कई कूटनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत के रुख में यह बदलाव पिछले कई वर्षों के निरंतर वैश्विक बदलाव और दीर्घकालिक हितों को लेकर नई प्रैक्टिकल सोच को दिखा रहा है।

ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत
- एक अधिकारी ने इस बारे में भारत के रुख को सामने रखते हुए कहा कि खामेनेई की मौत पर कई इस्लामिक देशों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। क्षेत्र की राजनीति भावनात्मक नहीं, सामरिक है। और वैसे भी अभी सिर्फ दो दिन हुए हैं, हो सकता है कि भारत सोच समझ कर आगे प्रतिक्रिया दे। अभी विलंब नहीं हुआ है।
- उक्त अधिकारी यह भी कहना है कि कूटनीति का असल मकसद होता है कि देश के नागरिकों के हितों की रक्षा करना। इस समय ईरान में सिर्फ 8-10 हजार भारतीय हैं, जबकि जिन देशों पर ईरान हमला कर रहा है, वहां एक करोड़ के करीब भारतीय रहते हैं। इनकी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।
- उक्त अधिकारी का इशारा ईरान की तरफ से यूएई, सउदी अरब, कतर, ओमान जैसे देशों की तरफ किये गये हमलों को लेकर था। इन देशों को होने वाले नुकसान का खामियाजा अंतत: भारत को भी उठाना पड़ेगा। ओमान में एक तेल टैंकर पर हुए हमले में एक भारतीय की मौत भी हुई है। सबसे ज्यादा भारतीय यूएई व सउदी में रहते हैं, जिनके साथ ईरान के संबंध बेहद तनापूर्ण हैं।
सभी देशों के साथ भारत के संबंध
अफगानिस्तान, नेपाल में राजदूत रह चुके भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी राकेश सूद का कहना है कि भारतीय कूटनीति में यह कोई नया बदलाव नहीं है बल्कि इसकी जमीन पिछले 6-7 वर्षों से तैयार हो रही थी। आप यह देखिए कि विगत कुछ वर्षों में इजरायल या सउदी अरब या यूएई से किस स्तर पर उच्चस्तरीय संवाद हो रहा था और इसकी तुलना आप ईरान के साथ होने वाले संपर्क से करें तो साफ हो जाएगा कि इन सभी देशों के साथ भारत के संबंध कि दिशा में जा रहे हैं।

हर क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी
- एक तरफ इन देशों के साथ लगातार रणनीतिक संवाद हो रहा है, सैन्य गठबंधन हो रहे हैं, कारोबार व निवेश की प्रगति हो रही है तो दूसरी तरफ ईरान के साथ संबंध यथावत हैं।
- भारतीय पीएम की अंतिम ईरान यात्रा वर्ष 2016 में हुई थी और भारत की यात्रा पर आने वाले अंतिम ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी थे जो फरवरी, 2018 में भारत आए थे।
- जबकि इस दौरान पीएम मोदी तीन बार सउदी अरब, सात बार यूएई और दो बार इजरायल की यात्रा कर चुके हैं। यूएई के साथ एफटीए हो चुका है, इजरायल को विशेष रणनीतिक साझेदार का दर्जा दिया गया है और सउदी अरब के साथ तकरीबन हर क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी बढ़ी है।
भारत और ईरान के संबंध
दरअसल, पिछले दो दशकों को देखा जाए तो भारत ने जब भी ईरान के साथ अपने संबंधों को नई ताजगी देने की कोशिश की तो इसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रतिबंध बहुत आड़े आया। इस प्रतिबंध की वजह से पहले भारतीय तेल कंपनियों को ईरान के तेल व गैस फील्ड में अपना निवेश रोकना पड़ा और इसकी वजह से ही भारत चाबहार पोर्ट से फिलहाल बाहर निकलता दिख रहा है।
चाबहार पोर्ट को भारत-ईरान संबंधों के नये अध्याय के तौर पर बताया गया लेकिन आम बजट 2026-27 में भारत ने इस पोर्ट के लिए कोई वित्तीय प्रावधान नहीं किया है। वर्ष 2019 के बाद भारत ने ईरान से कोई तेल की खरीद नहीं की है जबकि इसके पहले तक भारत को तेल बेचने वाले शीर्ष तीन देशों में ईरान रहा है।

प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा
विदेश मंत्रालय के अधिकारी इन फैसलों के पीछे भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को कारण बताते हुए कहते हैं इस माहौल में पारंपरिक “डी-हाइफनेशन” नीति (इजरायल व ईरान के साथ संबंधों को अलग-अलग ट्रैक पर संभालना) काम नहीं करेगी। भारत के लिए यह संतुलन बनाना अब संभव नहीं रहा था। प्राथमिकताएं अधिक स्पष्ट रूप से ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और उभरती आर्थिक साझेदारियों की ओर झुकी हुई हैं।
