नई दिल्ली, प्रेट्र। रेलवे स्टेशनों पर मौजूद 'पे एंड यूज' शौचालयों का इस्तेमाल करना जल्द सस्ता हो सकता है। रेलवे बोर्ड के एक नए प्रस्ताव के अनुसार, छोटे स्टेशनों पर तो इनका इस्तेमाल मुफ्त भी किया जा सकता है। इस बारे में बोर्ड ने 7 फरवरी को सभी जोनल रेलवे को एक पत्र भेजा है। इस पर एक महीने में फैसला होने की उम्मीद है।

'पे एंड यूज' टायलेट की मौजूदा नीति के तहत शौचालयों का निर्माण करने वाले ठेकेदार ही अभी बाजार रेट के आधार पर सुविधा शुल्क की दर तय करते हैं। इस तरह के ज्यादातर शौचालयों में अभी पेशाब करने लिए एक से दो रुपये और शौच व स्नान के वास्ते 15 से 20 रुपये सुविधा शुल्क के रूप में चार्ज किए जा रहे हैं। जबकि इस बारे में रेलवे के 2012 के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है। उसके अनुसार, पे एंड यूज टायलेट में केवल शौच के लिए दो रुपये और शौच के साथ स्नान करने पर पांच रुपये की राशि वसूली जानी चाहिए। रेलवे ने पेशाब करने को मुफ्त की श्रेणी में रखा है।

डीआरएम को लेना है निर्णय

इन गड़बडि़यों के मद्देनजर रेलवे बोर्ड की 2 फरवरी को हुई बैठक में इस नीति को बदलने का फैसला लिया गया। टायलेट इस्तेमाल की नई नीति के तहत मंडल रेलवे प्रबंधकों (डीआरएम) को इस बात का फैसला लेने के लिए अधिकृत किया गया है कि उनके अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले स्टेशनों के 'पे एंड यूज' शौचालयों का इस्तेमाल करने वाले लोगों से सुविधा शुल्क लिया जाए या उसे मुफ्त कर दिया जाए।' बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे को भेजे पत्र में कहा है, 'डीआरएम को स्थान विशेष का आकलन कर यह फैसला लेने का अधिकार दिया गया है कि 'पे एंड यूज' शौचालयों के निर्माण, संचालन और रखरखाव के काम को वे कमाई अनुबंध (अर्निग कांट्रेक्ट) या सेवा अनुबंध (सर्विस कांट्रेक्ट) में से किस श्रेणी में रखना चाहते हैं।' सर्विस कांट्रेक्ट के तहत टायलेट का इस्तेमाल करने वालों से नाममात्र की राशि या फिर कुछ नहीं लिया जाएगा।

लोग खुले में कर रहे शौच

रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, 'पे एंड यूज' टायलेट पॉलिसी की समीक्षा इसलिए करनी पड़ी क्योंकि स्वच्छ भारत मिशन के तहत पर्याप्त मात्रा में शौचालय नहीं बन पाए और ग्रामीण क्षेत्रों के छोट स्टेशनों पर मौजूद इस तरह के टायलेट का इस्तेमाल लोग नहीं कर रहे हैं।' उनका कहना है, 'इस तरह की रिपोर्ट है कि कई छोटे स्टेशनों पर लोग 'पे एंड यूज' टायलेट का इस्तेमाल करने की बजाय खुले में शौच कर रहे हैं।' नई नीति के तहत डीआरएम इस बात का भी फैसला ले सकते हैं कि उनके अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले स्टेशनों के इर्दगिर्द स्वच्छ भारत मिशन के तहत अभी कितने और टायलेट बनाने की जरूरत है। डीआरएम इस तरह के शौचालयों का निर्माण एनजीओ या स्वयं सहायता समूहों के जरिये कराने के भी अधिकारी होंगे। इतना ही नहीं वे शौचालय निर्माण में विशेषज्ञ संगठनों से इस बारे में करार भी कर सकते हैं।

By Manish Negi