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अमेरिकी मिडटर्म चुनाव: डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को टैरिफ पर मिलेगी राहत? रूसी तेल खरीद पर चुनौती संभव

By Jayprakash RanjanEdited By: Deepak Gupta
Published: Wed, 04 Nov 2026 10:23 PM (IST)

अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से राष्ट्रपति ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है, जिससे ...और पढ़ें

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को टैरिफ पर मिलेगी राहत। (पीटीआई)

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को टैरिफ पर मिलेगी राहत। (पीटीआई)

HighLights

  1. डेमोक्रेटिक जीत से ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर, भारत को लाभ।

  2. टैरिफ, व्यापार वार्ता और एच-1बी वीजा पर भारत को राहत।

  3. रूसी तेल खरीद पर भारत के लिए नई चुनौतियां संभव।

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर नियंत्रण हासिल करने और सीनेट में महत्वपूर्ण बढ़त दर्ज करने से राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ गई है। भारत-अमेरिका संबंधों पर इसका सीधा और बड़ा असर तो नहीं पड़ेगा लेकिन भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाने, व्यापार वार्ता, एच-1बी वीजा जैसे मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन पर निगरानी बढ़ने का परोक्ष तौर पर फायदा निश्चित तौर पर भारत को होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को कुछ क्षेत्रों में सीमित राहत मिल सकती है, जबकि रक्षा और सामरिक साझेदारी पर निरंतरता बनी रहेगी। हालांकि अमेरिकी संसद का नया स्वरूप रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दे या ईरान के साथ संबंधों को लेकर भारत सरकार की चुनौती बढ़ाने वाली भी साबित हो सकती है।

अमेरिका से साफ संकेत आ रहे हैं कि डेमोक्रेटिक नियंत्रित हाउस अब संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन की नीतियों की जांच कर सकता है, सुनवाई आयोजित कर सकता है और ट्रंप की कुछ महत्वाकांक्षी विधेयकों को धाराशायी कर सकता है।

भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों में टैरिफ, रूसी तेल खरीद पर दबाव और एच-1बी वीजा प्रतिबंधों को लेकर तनाव बढ़ा था। फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा अभी भी अंतिम रूप नहीं ले पाया है।

व्यापार वार्ता पर ट्रंप की नहीं चलेगी

व्यापार और टैरिफ के मोर्चे पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक टैरिफ और रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त दबाव डाला था। डेमोक्रेटिक हाउस इन टैरिफ नीतियों पर सुनवाई और जांच कर सकता है तथा राष्ट्रपति की टैरिफ लगाने की शक्तियों को सीमित करने के प्रयास कर सकता है। इससे भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में थोड़ी बेहतर सौदेबाजी की स्थिति मिल सकती है।

भारत और अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी लगातार कह रहे हैं कि कारोबारी समझौते को लेकर बातचीत करीब-करीब पूरी हो चुकी है और अब अंतिम रूप दिया जाना शेष है। इसके बावजूद यह याद रखना चाहिए कि ट्रंप के पास वीटो शक्ति और कार्यकारी प्राधिकरण अभी भी बरकरार है।

आईटी पेशेवरों को राहत संभव

अमेरिका का नया समीकरण एच-1बी वीजा और आव्रजन नीति पर भी ट्रंप प्रशासन की बेहद लोकलुभावन व राष्ट्रवादी नीतियों में बदलाव का दबाव बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में कुछ नई एच-1बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाई थी, जिसे बाद में एक वर्ष और बढ़ा दिया गया। अदालतों ने कुछ मामलों में इस फीस के क्रियान्वयन पर रोक लगाई है।

भारतीय पेशेवर एच-1बी स्वीकृतियों का लगभग 70 फीसद हिस्सा रखते हैं। लिहाजा ट्रंप सरकार की उक्त नीतियों का सबसे ज्यादा खामियाजा भारतीय आईटी पेशेवरों पर ही पड़ने की संभावना है। इस डर से ही कई आईटी कंपनियां अपने अमेरिका कस्टमर कंपनियों के लिए नई नियुक्तियों पर रोक लगाए हुए हैं।

डेमोक्रेटिक कांग्रेस इस फीस को कानून का रूप देने के किसी भी प्रयास को रोक सकती है और यूएससीआईएस तथा गृह सुरक्षा विभाग की नीतियों पर सख्त निगरानी रख सकती है। रिपब्लिकन नियंत्रित कांग्रेस की स्थिति में ऐसी सख्ती को विधायी समर्थन मिलने की संभावना अधिक थी।

रक्षा व रणनीतिक संबंधों पर असर नहीं

रक्षा, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक सहयोग के क्षेत्र में निरंतरता बने रहने की उम्मीद है। चीन को संतुलित करने की रणनीति, क्वाड सहयोग, रक्षा साझेदारी और सेमीकंडक्टर व कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में दोनों अमेरिकी दलों का व्यापक समर्थन है। मिडटर्म नतीजे इन मुद्दों को प्रभावित करने वाले नहीं माने जा रहे। इस महीने मनीला में क्वाड की बैठक होने वाली है और उसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी के दिसंबर, 2026 में अमेरिका जाने की भी संभावना है।

रूस से ऊर्जा खरीद पर बढ़ सकती है सख्ती

रूस संबंधी नीति पर हालांकि डेमोक्रेटिक कांग्रेस अधिक सख्त रुख अपना सकती है, जिससे भारत के ऊर्जा और रक्षा संतुलन पर कुछ अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। डेमोक्रेट्स परंपरागत रूप से रूस के खिलाफ ज्यादा कड़ा रुख रखते हैं और यूक्रेन को मजबूत समर्थन देते हैं। ईरान को लेकर भी उनका ऐसा ही रवैया है।

उन्होंने पहले से ही रूस व ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 फीसद तक शुल्क लगाने संबंधी कानून को पूरा समर्थन दिया था। इस कानून को अक्टूबर 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अस्थायी रूप से अस्थगित किया है लेकिन डेमोक्रेट-नियंत्रित कांग्रेस अब ज्यादा सख्ती की मांग कर सकती है। प्रशासन से जवाबदेही मांग सकती है और जरूरत पड़ने पर सख्त प्रतिबंधों (टैरिफ) लागू करने का दबाव बढ़ा सकती है।

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