एक 500 का नोट छापने में सरकार को कितने रुपये खर्च करने पड़ते हैं? UPI चार्ज से सरकारी खजाने पर कितना असर
यूपीआई शुल्क से छोटे लेनदेन पर असर न होने के बावजूद देश में नकदी का चलन बढ़ सकता है, क्योंकि ...और पढ़ें

यूपीआई शुल्क के बावजूद नकदी का चलन बढ़ने की आशंका

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने के नियम का असर छोटे लेनदेन पर तो नहीं होगा फिर भी देश में नकदी का चलन और बढ़ सकता है। यह आशंका इसलिए मजबूत हुई है क्योंकि हाल के वर्षों में डिजिटल लेन-देन तेजी से फैलने के बावजूद आम जनता के पास रखी नकदी भी तेजी से बढ़ी है।
शुक्रवार को जारी आरबीआई का डाटा बताता है कि 15 सितंबर 2026 को जनता के पास मुद्रा (नोट-सिक्के) 42,10,170 करोड़ रुपये थी, जो एक साल पहले की तुलना में 13.6 प्रतिशत अधिक है।
नोट छपने में कितना आता है खर्च?
आरबीआई के पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में भी चलन में बैंक नोटों का मूल्य 11.9 प्रतिशत बढ़कर 41.24 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था। इसी बीच नोट छपाई पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
डिजिटल लेनदेन के बावजूद बढ़ रही नकदी को देख कर ही आरबीआई के भीतर 1000 रुपये के नोट को दोबारा प्रचलन में लाने पर चर्चा हुई है, हालाकि हाल फिलहाल फैसला होने की संभावना नहीं है।
2000 रुपये से कम की ट्रांजेक्शन पर शुल्क पहले ही नहीं है। सरकार ने पुरजोर तरीके से दावा किया है कि इसका बोझ आम जनता पर नहीं पड़ने दिया जाएगा। हालांकि अभी लिखित तौर पर कोई नियम नहीं है। पर देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि दुकानदार, पेट्रोल पंप मालिक आदि नकदी पर जोर दे रहे हैं।
वैसे आरबीआई का डाटा खंगालने पर यह बात सामने आती है कि यूपीआइ के रोजमर्रा के भुगतान का बड़ा जरिया बनने के बावजूद नकदी की आदत खत्म नहीं हुई। ग्रामीण इलाकों, छोटी दुकानों, मजदूरी और कई घरेलू खर्चों में नोट अभी भी पसंद किए जाते हैं।
क्या दोबारा लौटेगा कैश का चलन?
मार्च 2026 के अंत तक नकदी-जीडीपी अनुपात बढ़कर 12.1 प्रतिशत रहा। एक वर्ष पहले यह अनुपात 11.7 फीसद था। शुल्क नहीं लगाये जाने के बावजूद नकदी का प्रसार बढ़ा है। अब जबकि शुल्क लगाने की व्यवस्था कर दी गई है तब जनता के पास नोटों की मांग और तेज होने की संभावना है।
नकदी की मांग बढ़ने का मतलब है कि ज्यादा नोटों की छपाई और आरबीआई का ज्यादा खर्च। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार नोटों की सुरक्षा छपाई पर खर्च 2025-26 में 4,875.2 करोड़ रुपये रहा। 2024-25 में यह 6,372.8 करोड़ रुपये था। पिछले कुछ वर्षों का औसत करीब 5,000 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है।
2025-26 में खर्च इसलिए घटा क्योंकि नए नोटों का आर्डर कम रहा, तकरीबन 2,81,000 लाख पीस, जबकि एक साल पहले 3,03,000 लाख पीस थे। मांग की पूर्ति काफी हद तक 500 जैसे ऊंचे नोटों से पूरी की गई है। कुल छापे गये नोटों के मूल्य की बात करें तो इसमें 85.5 फीसद सिर्फ 500 के नोटों का है।
वर्ष 2022 में भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्रा. लि.ल (बीआरबीएनएमपीएल) ने एक आरटीआई के जवाब में बताया था कि 10 का एक नोट छापने में 96 पैसे और एक 500 का नोट छापने में 2.29 रुपये की लागत आती है।
