UP Election 2027: भाजपा की हैट्रिक को कैसे रोक पाएगी सपा-कांग्रेस? विपक्ष के सामने नई चुनौती
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी की तैयारी में है, जबकि विपक्ष (सपा-कांग्रेस) मतदाता सूची ...और पढ़ें

अखिलेश यादव के साथ राहुल गांधी (फाइल फोटो)
HighLights
विपक्ष की SIR रणनीति को सुप्रीम कोर्ट से झटका
भाजपा विकास और कानून व्यवस्था पर तीसरी जीत का लक्ष्य
सपा-कांग्रेस को यूपी चुनाव में नए मुद्दे की तलाश
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब कुछ महीनों का ही समय बचा है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की आस में भाजपा विकास और मजबूत कानून व्यवस्था का मॉडल जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, तो विपक्ष की कोशिश है कि कोई मुद्दा खड़ा कर भगवा दल का विजय रथ रोका जाए। जातीय समीकरणों के सहारे भाजपा को घेरने की विपक्ष की तैयारी भले ही हो, लेकिन फिलहाल मुद्दे के नाम पर उसके हाथ खाली दिखाई दे रहे हैं।
सपा और कांग्रेस अब तक मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को ही सरकार के खिलाफ हथियार के रूप में धार देने के प्रयास में जुटी थी, लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसके विफल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने भी एसआईआर के वार की धार कुंद करने की परिस्थितियां बना दी हैं। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं।
भाजपा को मिली 400 सीटें
यहां विपक्ष का उत्साहित होना स्वाभाविक है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ भाजपा नेताओं के बयानों को ही आधार बनाकर सपा आरक्षण को मुद्दा बनाते हुए यह नैरेटिव बनाने में सफल रही कि भाजपा को 400 सीटें मिल गईं तो संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी। फिर जातीय बिसात भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अच्छी बिछाई।
आखिरकार भाजपा जीती और धीरे-धीरे आरक्षण में बदलाव का भ्रमजाल टूटने के बाद कई राज्यों में भाजपा को अप्रत्याशित जीत मिली। इसके बाद देशभर के विपक्षी दलों ने एसआईआर को मुद्दा बनाने का प्रयास शुरू कर दिया। आरोप लगाए कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से मदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं। चूंकि, धरातल में जनता को एसआईआर में कोई खामी दिखाई नहीं दी तो सबसे पहले बिहार और फिर पश्चिम बंगाल में भी विपक्ष को इस मुद्दे से कोई लाभ नहीं हुआ।
SIR पर दांव खेलने की तैयारी
इसके बावजूद सपा और कांग्रेस को विश्वास था कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति से इस मुद्दे को जनता के बीच खड़ा करने में सफल रहेंगी। सैफई परिवार से जुड़े सपा के एक राष्ट्रीय नेता ने दावा किया कि बिहार में भले सफलता नहीं मिली, लेकिन यूपी में सपा का संगठन मजबूत है, इसलिए एसआईआर का मुद्दा निर्णायक होगा। यही वजह है कि कांग्रेस ने एसआईआर योद्धा नियुक्त कर दिए। इसकी निगरानी के लिए प्रदेश और जिला स्तर पर कमेटी बना दी।
वहीं, सपा ने बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को एसआईआर की निगरानी पर लगा दिया और सपा प्रमुख लगातार इससे जुड़ी शिकायतों को ही इंटरनेट मीडिया पर प्रचारित-प्रसारित करने लगे। इसके साथ-साथ बिजली के स्मार्ट मीटर, बिजली संकट सहित अन्य मुद्दों पर भी सपा मुखर रही, लेकिन रणनीतिक तौर पर प्राथमिकता में एसआईआर ही रहा, लेकिन जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने एआईआर की प्रक्रिया को सही ठहरा दिया है, उसने विपक्ष के एजेंडे को करारा झटका दिया है।
निस्संदेह विपक्ष अभी भी इससे जुड़े विषयों को उठाने का प्रयास करता रहेगा, लेकिन काट में भाजपा के तर्कों को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मजबूत सहारा मिलेगा। ऐसे में विपक्ष के सामने सरकार के विरुद्ध नया मुद्दा खड़ा करने की चुनौती जरूर होगी।
