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अप्रकाशित किताब से संसद में छिड़ा संग्राम, सेना पर भारी पड़ी राजनीति? भाजपा के निशाने पर राहुल गांधी

Published: Wed, 04 Feb 2026 11:30 PM (IST)

संसद में पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवाने की अप्रकाशित पुस्तक पर विवाद छिड़ गया है। राहुल गांधी ने 2020 में ...और पढ़ें

अप्रकाशित किताब से संसद में छिड़ा संग्राम सेना पर भारी पड़ी राजनीति (फाइल फोटो)

अप्रकाशित किताब से संसद में छिड़ा संग्राम सेना पर भारी पड़ी राजनीति (फाइल फोटो)

HighLights

  1. नरवाने की अप्रकाशित पुस्तक पर संसद में विवाद।

  2. राहुल गांधी ने सरकार की कमजोरी का आरोप लगाया।

  3. भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा के राजनीतिकरण पर आपत्ति जताई।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। संसद में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवाने की अप्रकाशित पुस्तक पर संसद में छिड़े संग्राम से साफ है कि अब राजनीति सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसले पर भी भारी पड़ने लगी है।

इस अप्रकाशित पुस्तक के आधार पर ही लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी पूर्वी लद्दाख के कैलाश रेंज में 2020 में चीनी सेना के आगे बढ़ने के दौरान निर्णय लेने की जिम्मेदारी सेना प्रमुख पर छोड़े जाने को सरकार के शीर्ष नेतृत्व की कमजोरी के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहे हैं।

सरकार की ओर से इस आरोप का तीखा विरोध करते हुए जहां संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ बताया जा रहा़, वहीं कांग्रेस के शीर्ष नेता द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील विषय का राजनीतिकरण किए जाने का भी सत्ता पक्ष दावा कर रहा है।

पक्ष-विपक्ष आमने-सामने

पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने दावों के बीच हकीकत यह भी है कि इस विवाद के बहाने सेना और सरकार के बीच संवेदनशील सामरिक समन्वय तथा रणनीतिक कार्रवाई के मसले भी राजनीतिक बहस से अछूते नहीं रह गए।

संसद में नरवाने की पुस्तक पर गरम विवाद से साफ है कि राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार-सेना के आपसी संबंधों के बीच की आपसी विश्वास की संवेदनशील रेखा भी सियासी नफा-नुकसान की निगाहों से नहीं बच पाएगी।

अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देते हुए राहुल गांधी जिस तरह सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं उसका मतलब यह है कि सीमा पर किसी भी तरह की सैन्य चुनौती में जवाबी एक्शन का फैसला मोर्चे पर तैनात सैन्य कमांडर तथा शीर्ष सैन्य नेतृत्व नहीं बल्कि सरकार और प्रधानमंत्री के स्तर पर ही होता है।

किताब लेकर संसद पहुंचे राहुल गांधी

इसी विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए राहुल गांधी जनरल नरवाने के इस पुस्तक की एक प्रति हाथों में लेकर बुधवार को संसद भवन आए और उनके तेवरों से साफ है कि इसके सहारे वे सियासी तूफान खड़ा करने में अपनी तरफ से कसर नहीं छोड़ेंगे।

नरवाने की पुस्तक में दावा किया गया है कि 2020 में कैलास रेंज में जब चीनी सेना चार टैकों को लेकर आगे बढ़ रही थी तब नार्दन क्षेत्र के कमांडर की सूचना के बाद सेना प्रमुख ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से इस बारे में निर्देश मांगा। जवाब में विलंब हुआ तो विदेश मंत्री जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भी फोन किया।

इसके बाद दुबारा रक्षामंत्री को फोन किया तब उन्होंने प्रधानमंत्री से बात करने के बाद बताया कि कि शीर्ष नेतृत्व ने कहा है कि जो उचित समझो, करो। राहुल गांधी का आरोप है कि जब सीमा पर गंभीर संकट की स्थिति थी तब राजनीतिक नेतृत्व ने दो घंटे से अधिक की देरी की और अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय निर्णय लेने का दायित्व सेना प्रमुख पर छोड़ दिया और यह राजनीतिक नेतृत्व की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।

लेकिन सत्ता पक्ष इस तर्क को आधारहीन बताते हुए इसे सेना को राजनीतिक बहस में घसीटने का नेता विपक्ष द्वारा किया जा रहा प्रयास बता रहा है। सत्तापक्ष का कहना है कि मोर्चे पर चुनौतियों का जवाब कैसे देना है इसकी रणनीति सेना के स्तर पर ही होती है।

इस लिहाज से नरवाने को दी गई सलाह सेना तथा सरकार के बीच स्थापित संचालन व्यवस्था के तहत सैन्य और राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया की कार्यप्रणाली का हिस्सा था। बेशक हमारी संघीय व्यवस्था में सेना पूरी तरह सरकार के अधीनस्थ है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सामरिक निर्णय सीधे राजनीतिक नेतृत्व द्वारा ही लिया जाता है।

कई बार संकट की स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व व्यापक नीति और दिशा तय करता है और जमीनी हालात के अनुसार मोर्चे पर तत्कालिक निर्णय सेना प्रमुख और उनके कमांडरों पर छोड़े जाते हैं। सत्ता पक्ष का मानना है कि जो उचित समझो, करो का पीएम का निर्देश वस्तुत: इसी स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा था।

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ऐसे में इसे नेतृत्व की विफलता के रूप में पेश करना सरकार-सेना के बीच कार्य संचालन की स्थापित प्रणाली के पहलुओं को नकारना है। सेना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना इस दृष्टि से भी वाजिब नहीं कि यदि कैलास रेंज में जमीनी हालात के अनुसार निर्णय लेने के लिए सेना प्रमुख को जिम्मेदारी दी गई तो यह सामरिक-रणनीतिक विवेक का भी हिस्सा हो सकता है।

ऐसे में इस पहलु को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सेना प्रमुख पर दायित्व छोड़ने के प्रधानमंत्री के जिस कदम को राहुल गांधी उनकी कमजोरी बता रहे हैं वह चीन की सामरिक चुनौती से निपटने की रणनीति का हिस्सा रहा हो। बेशक अहम विषयों पर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी है मगर राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना और राजनीतिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही अहम है।

जनरल नरवाने की पुस्तक को लेकर बढ़ते इस विवाद से इस संतुलन के टूटने की आशंका गहरी है। हर सैन्य निर्णय यदि राजनीतिक बहस का विषय बनाया गया तो इससे भविष्य में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच भरोसे का ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।

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