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सुधारों के साथ आकार लेगा 'नया यूएन', समय के साथ बढ़ेगा भारत का कद: सैयद अकबरूद्दीन

By Rumani GhoshEdited By: Shubham Tiwari
Published: Sat, 31 Oct 2026 07:25 PM (IST)

पूर्व भारतीय राजदूत सैयद अकबरूद्दीन ने संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया है, जिससे भारत के लिए ...और पढ़ें

सुधारों के साथ आकार लेगा नया यूएन- सैयद अकबरूद्दीन

सुधारों के साथ आकार लेगा नया यूएन- सैयद अकबरूद्दीन    

HighLights

  1. संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है।

  2. भारत को स्थायी सदस्यता के लिए धैर्य रखना होगा।

  3. ओएचसीएचआर की टिप्पणियों को गंभीरता से न लें।

नई दिल्ली, रुमनी घोष। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्च कमिश्नर के कार्यालय (ओएचसीएचआर) के विशेषज्ञों ने हाल ही में भारत में हो रहे प्रदर्शन और रैलियों को लेकर टिप्पणी की। इसे देश के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी मानते हुए भारी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। वहीं बदले दौर में 'नए यूएन' की मांग भी उठने लगी है? यह मांग कितनी प्रासंगिक है और वर्तमान संदर्भों में भारत को क्या कदम उठाना चाहिए?

पूर्व भारतीय राजदूत और वर्ष 2016 से 2020 तक यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे सैयद अकबरूद्दीन कहते हैं यूएन की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए इस संगठन में रिफार्म्स (सुधारों) की जरूरत है। इन सुधारों के साथ ही नए यूएन की परिकल्पना साकार होगी। इसके साथ ही यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधित्व का रास्ता सुगम होगा। वर्तमान में हैदराबाद स्थित कौटिल्य स्कूल आफ पालिसी रिसर्च में बतौर डीन सेवाएं दे रहे अकबरूद्दीन का सुझाव है कि हड़बड़ी करने के बजाय भारत को और धैर्य के साथ स्थितियां अनुकूल होने का इंतजार करना चाहिए।

1985 बैच के आइएफएस अकबरूद्दीन पाकिस्तान, जेद्दा, मिस्र, काहिरा सहित कई देशों में पदस्थ रहे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और शांति-स्थापना के कार्यों से जुड़े रहे। उनके कार्यकाल में कुख्यात आतंकी मसूद अजहर का नाम यूएन द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकियों की सूची में शामिल हुआ था। 'भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन' के मुख्य समन्वयक थे। इस महत्वपूर्ण आयोजन में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य सभी 54 अफ्रीकी देशों और अफ्रीकी संघ ने भाग लिया था। 2006 से 2011 तक उन्होंने वियना में 'अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी' (आइएइए) में एक अंतरराष्ट्रीय सिविल सेवक के रूप में भी काम किया। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने यूएन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सैयद अकबरूद्दीन से आनलाइन चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने भारत में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को मानव अधिकार का उल्लंघन बताया। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन को ओएचसीएचआर मानव अधिकार का उल्लंघन कैसे बता सकता है?

मुझे लगता है कि इस मामले को लेकर अनावश्यक रूप से हल्ला मचाया जा रहा है। ओएचसीएचआर के सदस्यों द्वारा की गई टिप्पणी की कोई अहमियत नहीं है।

ओएचसीएचआर की अहमियत क्यों नहीं है...? क्या यह यूएन का हिस्सा नहीं है?

संयुक्त राष्ट्र ह्यूमन राइट्स काउंसिल (यूएनएचआरसी) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) दोनों संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन इनकी प्रकृति, भूमिका और संरचना में बहुत अंतर है। मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले यूएन की मूल व प्रभावी संस्था है संयुक्त राष्ट्र ह्यूमन राइट्स काउंसिल (यूएनएचआरसी)। यदि ह्यूमन राइट्स काउंसिल द्वारा कोई रिपोर्ट जारी होती या फिर उनकी कोई टीम जांच के लिए आती तो निश्चित रूप से इसे गंभीरता से लेना चाहिए था, लेकिन इसके द्वारा न तो टिप्पणी की गई और न ही कोई रिपोर्ट मांगी गई।

जबकि, ओएचसीएचआर मानव अधिकार आयोगों के क्षेत्र में काम करने वाले दुनियाभर के लोगों का एक समूह है। इसे इस तरह से समझिए, कि किसी मुद्दे पर सेवानिवृत्त अधिकारियों या जजों ने हस्ताक्षर कर अपना संयुक्त बयान जारी किया हो। इसे सरकार या कोर्ट की आधिकारिक राय तो नहीं मानी जा सकती है। यह व्यक्ति विशेष या उनके समूहों की निजी राय है। भारत में हुए रैली-प्रदर्शन को लेकर भी कुछ लोगों ने अपनी राय व्यक्त की है। इसे तवज्जो क्यों दी जानी चाहिए?

...फिर विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर टिप्पणी को खारिज क्यों किया?

संभवतः इसलिए...ताकि गैर जरूरी मुद्दे को हवा न मिल सके। इंटरनेट मीडिया के दौर में शायद इसकी जरूरत है।

ह्यूमन राइट्स काउंसिल किस तरह से काम करती है? प्रक्रिया क्या है?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद दुनिया भर में मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए काम करती है। 2006 में स्थापित इस संगठन में 47 देश सदस्य हैं। सदस्य देशों का चयन क्षेत्रीय समूहों के आधार पर तीन साल के लिए किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद किसी विशेष देश या संकट वाले क्षेत्र में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा करने के लिए प्रस्ताव पारित करती है। रिपोर्ट्स तैयार करती है। यही नहीं, हर साढ़े चार साल में एक बार सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकार्ड की समीक्षा की जाती है। इसकी एक तय प्रक्रिया है। यह संयुक्त व समग्र रिपोर्ट होती है। निजी विचारधारा या वक्तव्य का कोई मतलब नहीं होता है।

बदलते वर्ल्ड आर्डर में क्या यूएन की प्रासंगिकता बची है या आने वाले समय में रहेगी?

यूएन की प्रासंगिकता पहले भी थी और आगे भी रहेगी...लेकिन समय के साथ रिफार्म्स (सुधारों) की जरूरत है।

नए यूएन के गठन की मांग भी उठ रही है...क्या यह बदलाव संभव है?

नए यूएन से आशय कोई अलग संगठन नहीं है। दरअसल, समय के साथ जरूरी रिफार्म्स (सुधार) कर संगठन के दायित्व, अधिकारों और दायरों को नए सिरे से चिह्नित किया जाए। खासतौर पर विकासशील देशों के लिए यह बेहद जरूरी है।

अमेरिका जैसे देश यूएन के दिशा-निर्देशों को मानने को तैयार नहीं? ट्रंप ने कार्बन उत्सर्जन को लेकर दिए गए गाइड लाइंस को मानने से इन्कार कर दिया। फिर इसकी प्रासंगिकता क्यों है?

ट्रंप के शासनकाल में जरूर इस तरह की स्थिति बनी, लेकिन आगे स्थिति सुधरने की उम्मीद है। बाइडन के शासनकाल में यूएन के दिशा-निर्देशों का पालन हुआ था। बाकी देशों द्वारा भी इसे मान्यता दी जाती है।

क्या यूएन का वैकल्पिक संगठन संभव है? विकसित देशों का एकाधिकार खत्म करने के लिए विकासशील देशों का समूह (जी 4 या एल-69) मिलकर नया संगठन नहीं बना सकते?


यह व्यावहारिक नहीं होगा। जिस संगठन के अधीन 190 देश हैं, उनमें से चंद 20-30-40 देश अलग संगठन बनाकर क्या दुनिया की समस्याओं को हल कर पाएंगे? जलवायु परिवर्तन जैसे व्यापक मुद्दे पर तो अलग संगठन बनाकर लड़ा जा सकता है? चलिए, जलवायु परिवर्तन जैसा व्यापक मुद्दा और भविष्य की चुनौती को छोड़िए, दैनिक गतिविधियों पर बात करते हैं। हवाई यात्रा...हम दुनिया से हवाई मार्ग से जुड़े हैं। यदि यूएन जैसा संगठन नहीं होगा तो सभी देशों को अलग-अलग अनुबंध करना होगा। इनमें से प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन देश अनुमति नहीं दें, तो आप उनके हवाई मार्ग से नहीं जा सकते हैं। इससे कितनी विकट स्थिति पैदा होगी। ...इसलिए पूरी दुनिया के बीच समन्वय के लिए यूएन तो जरूरी है, बस रिफार्म्स की जरूरत है। और इससे भी बड़ा मुद्दा है बजट...वह कौन जुटाएगा?

बजट से आपका क्या आशय है?

यूएन जैसे संगठन को चलाने के लिए जितने बजट की जरूरत है, उसका अधिकांश हिस्सा पांच देश देते हैं। अमेरिका यूएन के कुल बजट का 22 प्रतिशत देता है और भारत लगभग एक प्रतिशत।

तो फिर आप कैसे कह रहे हैं-भारत की स्थिति मजबूत है ..या मजबूत हो रही है?

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग अपने आप में अनूठी है...भारत एक बड़ा देश है। जनसंख्या के लिहाज से, इसकी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। एक ओर जहां ब्रिटेन, रूस, जापान जैसे देशों की स्थिति समय के साथ कमजोर हुई है। उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है और उन्होंने यूएन में अपनी भागीदारी घटाई है। वहीं भारत ने भागीदारी में स्थिरता बनाए रखी है। इसलिए, चुनौती भारत की सदस्यता को लेकर नहीं है। हम यह कह सकते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में पांच वीटो पावर वाले देशों के बाद छठे नंबर पर भारत की दावेदारी ही है। बेशक पाकिस्तान जैसे देश भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध करेंगे, लेकिन उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।

भारत 32 साल से यूएन में स्थायी सदस्यता और वीटो पावर की मांग कर रहा है..आखिर यह 'लड़ाई' और कितनी लंबी चलेगी?

लड़ाई तो लंबी है...हमें धैर्य रखना होगा। अब लड़ाई लंबी क्यों है, इसे समझने के लिए यूएन के गठन के इतिहास और वर्तमान परिस्थिति दोनों को आमने-सामने रखकर समझना होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विजेता देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ और च्यांग काई शेक वाले चीन गणराज्य (1971 में चीन गणराज्य की जगह चीन को मान्यता मिली) ने मिलकर इस वैश्विक संगठन को खड़ा किया था। 1945 में जब इसकी स्थापना की गई, तब 51 संस्थापक सदस्य थे। आज 193 देश इसके सदस्य हैं। अब बात यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो पावर की...तो विश्व पर दबदबा कायम रखने के लिए पांचों देशों ने अपने पास वीटो पावर रखा। वर्तमान में 193 देश हैं।

भारत ने आधिकारिक तौर पर 1994 में संयुक्त राष्ट्र की 49वीं महासभा के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश की थी। भारत के साथ ब्राजील, जर्मनी और जापान भी स्थायी सदस्यता की मांग कर रहे हैं। इसे जी-4 देश कहा जाता है। इसके अलावा अफ़्रीकी संघ (55 देशों का समूह) ने भी इसकी मांग की है। कुल मिलाकर वर्तमान में 10 से ज्यादा देश हैं, जो स्थायी सदस्यता की दावेदारी कर रहे हैं। पेंच यह है कि 12 देशों का एक समूह है, जो जी-4 देशों की स्थायी सदस्यता का विरोध करते आ रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से अर्जेंटीना (कोलंबिया, मैक्सिको और कोस्टा रिका के साथ ब्राजील की दावेदारी का विरोध), कनाडा, कोलंबिया, कोस्टा रिका, इटली (स्पेन, सैन मैरिनो और माल्टा के साथ जर्मनी की उम्मीदवारी का प्रमुख विरोधी), माल्टा, मैक्सिको, पाकिस्तान (तुर्की के साथ भारत की स्थायी सदस्यता का कड़ा विरोध करने वाला देश) दक्षिण कोरिया (जापान की स्थायी सदस्यता का विरोध करने वाले देशों में शामिल) सैन मैरिनो, स्पेन, तुर्किये हैं। एशिया और अफ्रीका को मिलाकर लगभग 108 सदस्य हैं। इनका दावा है कि इनकी भागीदारी ज्यादा होनी चाहिए, लेकिन किस देश को सदस्यता दी जाए और किसे छोड़ा जाए, इसको लेकर एकमत होना बहुत कठिन है। जियोपालिटिकल स्थिति की भी वजह से समय-समय पर यह मुद्दा उलझता-सुलझता रहता है।

वीटो पावर का दायरा बढ़ाने में क्या बाधा है? यदि पांच के बजाय 10 देशों के पास वीटो पावर देने में क्या परेशानी है?


पहला सवाल यह है कि अगर वीटो का दायरा बढ़ाते हैं, तो किन-किन देशों को और किस आधार पर वीटो पावर दिया जाए। वर्तमान के 193 सदस्य देशों में से एशिया और अफ्रीका को मिलाकर लगभग 108 सदस्य हैं। अमेरिका-यूरोप की तुलना में यह क्षेत्र लगभग गुना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इनमें से अधिकांश देश पराधीन थे या भारत जैसे देश पराधीनता से बस मुक्त ही हुए थे। उस समय कोई विकल्प नहीं था और वीटो पावर की शर्त को मानना पड़ा था। आज स्थितियां अलग हैं। तीसरा, जितने ज्यादा देशों के पास वीटो पावर होगा, उतनी ज्यादा निष्क्रियता पैदा हो सकती है।

तो ऐसे तो यह लड़ाई कभी नहीं सुलझेगी?


नहीं, मैं यह नहीं मानता हूं। स्थायी प्रतिनिधि के तौर पर अपने कार्यकाल में मैंने महसूस किया कि धीरे-धीरे और गतिरोध के साथ सही लेकिन यूएन में बहुत से रिफार्म्स हुए हैं। आगे भी होंगे।

दूसरे देशों की तुलना में भारत की स्थिति इस परिप्रेक्ष्य में कितनी मजबूत है? भारत को क्या करना चाहिए?


धैर्य रखना...सबके साथ मिलकर यूएन में रिफार्म्स लाना और अपनी स्थिति मजबूत करते हुए स्थायी सदस्यता की मांग को बरकरार रखना।

और वीटो पावर? एक बड़े वर्ग का मानना है कि भारत को इसकी जिद छोड़ देनी चाहिए?


यदि हमारे सामने स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव रखा जाए...और कहा जाए कि 10 साल के कार्यकाल के बाद वीटो पावर पर विचार किया जाएगा, तो हमें क्या करना चाहिए...। मुझे लगता है कि हमें धैर्य के साथ इस पर विचार करना चाहिए कि अभी जो मिल रहा है, उसे ले लेते हैं। एक लड़ाई जीतने के बाद आगे की लड़ाई लड़ेंगे।

आप बार-बार रिफार्म्स की बात कर रहे हैं? मुख्य रिफार्म्स क्या हैं और उन्हें लागू करने में क्या बाधाएं हैं?

एक राजनयिक के रूप में अपने पूरे करियर में देखा है कि व्यवस्था में हर कुछ वर्षों में कोई न कोई सुधार होता रहता है। बेशक यूएन में यह प्रक्रिया बहुत धीमी है। यूएन की संरचनाओं में सुधार पिछले 80 से अधिक वर्षों में केवल एक बार हुआ है। ...वह भी 1960 के दशक की शुरुआत में हुआ था, जब संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या 55 से बढ़कर लगभग 90 हो गई थी। जहां तक रिफार्म्स की बात है, तो यूएन में एक वर्ग समूह (देशों) का मानना है कि वीटो पावर की शक्ति को धीरे-धीरे कम करनी चाहिए। खासतौर पर गंभीर अपराधों के मामलों में इसका उपयोग नहीं होना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन और फ्रांस ने 1989 के बाद से वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है। केवल तीन देश अमेरिका, रूस और चीन ने ही इसका उपयोग किया है और वे अपनी शक्तियां क्यों क्षीण करना चाहेंगे?

...तो भारत के पास क्या विकल्प है?

वर्तमान में स्थितियां भारत के लिए अनुकूल हैं। ग्लोबल साउथ के साथ वैश्विक परिदृश्य में भी लगातार हमारा दखल बढ़ रहा है। चीन के बाद गरीबी को कम करने में भारत ने बड़ी भूमिका निभाई है। हमारी अर्थव्यवस्था लगातार सुदृढ़ हो रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि समय के साथ स्थितियां बदलेंगी।

आतंकी मसूद अजहर का नाम अंतरराष्ट्रीय आतंकियों की सूची में शामिल करवाने के लिए क्या रणनीति अपनाई थी?


वर्ष 2009 से कंधार विमान अपहरण, संसद हमलों का सरगना आतंकी मसूद अजहर का नाम शामिल करने की मांग की जा रही थी। वर्ष 2016 में जब मेरी पदस्थापना हुई तो मैंने भी उस मांग को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाया, हालांकि हमें सफलता नहीं मिल रही थी। यूएन के अस्थायी सदस्य हमारी मांग से सहमत थे। पांच स्थायी सदस्यों में से चार (अमेरिका, यूके, रशिया और फ्रांस) को भी कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन चीन इसके लिए सहमत नहीं हो रहा था। इस बीच 2019 में पुलवामा आतंकी हमला हुआ, जिसका मास्टर माइंड भी मसूद अजहर ही था।

इस बार हमने रणनीति बनाई और यूएन के स्थायी सदस्यों तक यह बात पहुंचाई कि अब भारत यूएन के ओपन फोरम में अपनी मांग रखेगा। अब चीन के लिए यह दुविधा थी कि या तो वह भारत का समर्थन कर मसूद अजहर का नाम सूची में शामिल करने की सहमति दे या ओपन फोरम में आकर वीटो का उपयोग करे। यदि चीन ओपन फोरम में वीटो का उपयोग करता तो उसे दुनिया के सामने सार्वजनिक रूप से यह जवाब देना पड़ता कि आखिर वह कुख्यात आतंकी का समर्थन क्यों कर रहा है। इससे चीन की छवि खराब हो सकती थी। आखिरकार चीन को समर्थन देना पड़ा और 2019 में इसे शामिल कर लिया गया। यह एक बड़ी उपलब्धि थी।

193 सदस्य देशों वाली यूएन महासभा द्वारा आगामी वर्ष के लिए 3.45 अरब डालर का बजट स्वीकृत किया गया है। इस बजट के जरिए राजनीतिक मामलों, अंतरराष्ट्रीय न्याय व कानून, विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग, मानवाधिकारों, मानवतावादी प्रयासों और जनसूचना समेत अन्य कामकाज के लिए वित्तीय संसाधन मुहैया कराए जाते हैं।

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