रांची (सुरभि)। आधुनिकता को अपना चुके नई पीढ़ी के आदिवासी युवा अपनी समृद्ध लोक कलाओं की ओर वापस लौट रहे हैं। ओल्ड इज गोल्ड की तर्ज पर इन्होंने लोक संगीत को नए कलेवर में प्रस्तुत करना सीख लिया है। झारखंड में ऐसे सैकड़ों रॉक बैंड सक्रिय हैं, जिनका संचालन आदिवासी युवा कर रहे हैं। इन्होंने अपने हुनर से देश-विदेश में अलग पहचान बनाई है। आधुनिक मंच पर जहां ये अपनी लोककला को विस्तार देने और उसे सहेजने का काम कर रहे हैं, वहीं यह मंच इन्हें आर्थिक आधार मुहैया करा रहा है।

करिया करिया केश झूलेला... : नए-पुराने वाद्ययंत्रों के साथ अपनी भाषा और लोक संगीत का फ्यूजन कर इन्होंने जो म्यूजिक ईजाद किया है वह कमाल का है। इन्होंने अखड़ा भाषा में गेलो नजर गीत का फ्यूजन बनाया, जो युवाओं में काफी लोकप्रिय है। इसके अलावा करिया करिया केश झूलेला भी न सिर्फ झारखंड बल्कि अन्य प्रदेशों में भी युवाओं को पसंद आ रहा है।

बॉलीवुड में भी गूंज : ये युवा बॉलीवुड फिल्मों में भी संगीत देने लगे हैं। अभिलाष लकड़ा बंदूकबाज फिल्म में संगीत दे चुके हैं। आइरिस-13 बैंड के साकेत परमा को स्ट्रॉबेरी फील्ड्स अवार्ड मिल चुका है। रवीश तिर्की, अर्पित, असीम भी उभरते हुए चेहरे हैं।

समृद्ध लोक संस्कृति : संथाल, बंजारा, बिहोर, चेरो, गोंड, हो, खोंड, लोहरा, माई पहरिया, मुंडा, ओरांव... ऐसे 32 से अधिक आदिवासी समूहों का प्राकृतिक आवास है झारखंड। नृत्य और संगीत ही देश के पूर्वी इलाके में बसे इस राज्य की विशिष्ट पहचान है। इनके लोक संगीत की बात करें तो एक्हरिया डोमकच, ओरजापी, झूमर, फगुआ, वीर सेरेन, झीका, फिलसंझा, अधरतिया, भिनसरिया, डोड, असदी, झूमती, धुरिया... ऐसे विभिन्न लोक संगीतों की समृद्ध संस्कृति को ये अपने में समेटे-सहेजे हुए हैं। इनके अपने वाद्ययंत्र भी हैं।

नगाड़ा, मांदर, ढाक, धमसा, दमना, मदन भेवरी, आनंद लहरी, तूइला, व्यंग, बंसी, शंख, करहा, तसा, थाल, घंटा, कदरी और गुपी जन्तर..ऐसे न जाने कितने अनोखे उपकरणों का प्रयोग ये अपने संगीत में करते हैं। आधुनिकता के दौर में इनकी लोक कलाएं लुप्त होती जा रही थीं। लेकिन अब जो हो रहा है, उसके अपने अलग मायने हैं। भारतीय लोक कला मूलत: आदिवासी समूहों द्वारा संरक्षित कला है। इस लिहाज से झारखंड में दिख्राई दे रहा यह बदलाव अहम है।

लोक संगीत को दे रहे नया आयाम
ये आदिवासी युवा एक अलग ही संगीत विकसित कर रहे हैं, जो युवा पीढ़ी को रास आ रहा है। इन्होंने अपने लोक संगीत को नए अंदाज में गढ़ दिया है। क्षेत्रीय भाषा को भी रॉक में उकेरा है, जिसका फ्यूजन लोगों को काफी पसंद आ रहा है। बाहरी दुनिया के लिए यह संगीत एकदम नया है। यही कारण है कि इसे पसंद किया जा रहा है। राजधानी रांची में ही 150 से अधिक बैंड हैं, जिनमें आदिवासी युवाओं की संख्या अधिक है। आइरिस-13, हाईवे-69, विकृत, रेसिपोकल, मृगतृष्णा, होनविल एलओसी, सोशलकॉज, निमग्न, ग्रेविटी, अर्बनसेचेर्स और अतृप्त जैसे कई रॉक बैंड हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

-150 से अधिक रांची में 150 ही है रॉक बैंड

-काम आ रही लोक संगीत की पारंपरिक शिक्षा

-संगीत को जीविकोपार्जन का साधन बना रहे

हम रोज कड़ी मेहनत करते हैं, ताकि अपने म्यूजिक को एक अलग मुकाम पर ले कर जा सकें। हमारे पास रिसोर्सेज की कमी जरूर है, लेकिन हौसले की नहीं। लोगों को हमारा संगीत काफी पसंद आ रहा है। -साकेत परमा, गिटारिस्ट, आईरिस-13 बैंड

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Posted By: Srishti Verma

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