नई दिल्ली [जागरण स्पेशल] आमतौर पर राजा महाराजा एक लीक पर ही चलते रहते है मगर मैसूर के राजा टीपू सुल्तान के साथ ऐसा नहीं था, वो एक प्रयोगवादी राजा थे। जनता और सेना के लिए नई चीजों का प्रयोग करने की वजह से उन्हें अलग तरह का नेता माना जाता था। उनका पूरा नाम फतेह अली साहब टीपू था। उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फातिमा फखरूनिशा था। उनको मैसूर टाइगर के नाम से भी जाना जाता था।

नई राजस्व नीति अपनाई 

टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में तरह-तरह के प्रयोग किए, इसी बदलाव के चलते उनको एक अलग उपाधि भी मिली। उन्होंने प्रशासनिक बदलाव करके नई राजस्व नीति को अपनाया, जिससे काफी फायदा हुआ। इसके साथ ही उन्होंने सेना की युद्ध क्षमता में बेहतरीन इजाफा भी किया, उनको ही रॉकेट का आविष्कारक माना जाता है। ऐसे वीर टीपू सुल्तान का आज जन्मदिन है। उनका जन्म 20 नवंबर 1750 को हुआ था, उनकी मृत्यु 5  मई1799 में हुई थी। उन्हें अंग्रेजों की खिलाफत करने वाला बहादुर योद्धा कहा जाता था। 

लड़ाई में रॉकेट का इस्तेमाल करने वाले पहले राजा 

अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो हमें यह जानकारी मिलती है कि टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के पास 50 से अधिक रॉकेटमैन थे। टीपू सुल्तान ने अपनी सेना में इन रॉकेटमैन का बखूबी इस्तेमाल किया था। ये रॉकेटमैन रॉकेट चलाने के एक्सपर्ट थे, युद्ध के दौरान ये ऐसे निशाने लगाते थे कि विरोधियों को भारी नुकसान होता था। टीपू सुल्तान के शासनकाल में ही मैसूर में पहली लोहे के केस वाली मिसाइल रॉकेट को विकसित किया गया। मिसाइल रॉकेट का वैसे तो टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के आदेश पर इसका निर्माण किया गया। लेकिन टीपू सुल्तान ने इस रॉकेट में समय के साथ कई बदलाव करके इसकी मारक क्षमता में जबरदस्त इजाफा किया।

सबसे अधिक किए प्रयोग 

टीपू सुल्तान के समय में मिसाइल रॉकेट का सबसे ज्यादा प्रयोग किया किया, जो अंग्रेजों की डर की एक वजह बना था। इसी मिसाइल रॉकेट के जरिए टीपू सुल्तान ने युद्ध में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। टीपू सुल्तान ने 18वीं शताब्दी में मिसाइल रॉकेट का उचित ढंग से उपयोग किया था। वो अपनी सेना में मिसाइल रॉकेट की उपयोगिता को समझते थे। इसी के चलते उन्होंने सेना में मिसाइल रॉकेट के विकास और रखरखाव को लेकर एक अलग यूनिट स्थापित की थी। 

बांस के बने रॉकेट का किया था आविष्कार 

टीपू सुल्तान ने सबसे पहले बांस से बने हुए रॉकेट का आविष्कार किया था। इस वजह से उनके जलने का खतरा रहता था। ये रॉकेट करीब 200 मीटर तक हवा में दूरी तय कर सकते थे। इनको उड़ाने के लिए 250 ग्राम तक बारूद का इस्तेमाल किया जाता था। टीपू सुल्तान ने बाद में बांस की जगह लोहे का इस्तेमाल किया। ये रॉकेट पहले के मुकाबले ज्यादा दूरी तय करते थे। इनमें ज्यादा बारूद का इस्तेमाल किया जा सकता था। जिससे ये बड़े इलाके को नुकसान पहुंचा पाते थे। मॉडर्न रॉकेटरी के जनक रोबर्ट गोडार्ड ने भी टीपू सुल्तान को रॉकेट का जनक माना है। टीपू सुल्तान द्वारा इजाद की गई मिसाइल का नाम 'तकरनुकसाक' रखा गया था। ये फारसी भाषा का शब्द है।

टीपू सुल्तान की मौत के बाद इंग्लैंड भेज दी गई मिसाइलें 

ये भी कहा जाता है कि जब टीपू सुल्तान की मौत हो गई तो उनके द्वारा निर्मित की गई बहुत सी मिसाइलों को अंग्रेजों ने इंग्लैंड भेज दिया। रॉयल वूलविच आर्सेनल में इन रॉकेट में अनुसंधान करके नए और उन्नत किस्म के रॉकेट का निर्माण किया। आगे चलकर अंग्रेज़ों के इन रॉकेटों का युद्ध में बखूबी इस्तेमाल करते हुए अपने दुश्मनों को हराने में कामयाबी हासिल की। अंग्रेज भी भारत की इस तकनीक का इस्तेमाल आगे बढ़ते गए। उन्होंने टीपू सुल्तान की इजाद की गई मिसाइलों पर खूब रिसर्च भी किया और उसे उन्नत किस्म का बनाया।  

Posted By: Vinay Tiwari

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप