नई दिल्ली [राहुल लाल]। उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति को निष्क्रिय इच्छामृत्यु का कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया है। उसने अपने टिप्पणी में कहा है कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोई व्यक्ति लिविंग विल तैयार करके यह मांग कर सकता है कि अगर भविष्य में वह स्वास्थ्य से जुड़ी लाइलाज या मरणासन्न स्थिति में चला जाए, जिसमें तमाम आधुनिक इलाजों के बावजूद उबरना मुश्किल हो तो उसको जीवनरक्षक प्रणाली से हटा दिया जाए। इच्छामृत्यु (यूथेनेशिया) के दो प्रकार हैं-पहला सक्रिय इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथेनेशिया) और दूसरा निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) है। इन दोनों में काफी अंतर है।

निष्क्रिय रूप से इच्छा मृत्यु 

किसी लाइलाज और पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को निष्क्रिय रूप से इच्छा मृत्यु दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि जीवनरक्षक उपायों जैसे-दवाई, डायलिसिस और वेंटिलेटर को बंद कर दिया जाए अथवा रोक दिया जाए। इसमें पीड़ित स्वयं को मृत्यु को प्राप्त होगा। दूसरी ओर एक्टिव यूथेनेशिया या सक्रिय इच्छामृत्यु वह है, जिसमें चिकित्सक पेशेवर या कोई अन्य व्यक्ति कुछ जानबूझकर ऐसा करते हैं, जो मरीज के मरने का कारण बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है, एक्टिव की नहीं। सरल शब्दों में सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच के अंतर को मरने और हत्या के बीच अंतर के रूप में भी देखा जा सकता है।

एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव

लिविंग बिल को एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव भी कहते हैं, जिसमें व्यक्ति यह घोषणा करता है कि भविष्य में किसी ऐसी बीमारी से अगर वह ग्रस्त हो जाता है, जिसमें तमाम आधुनिक इलाजों के बावजूद उसका इलाज संभव न हो तो, उसका इलाज नहीं किया जाए। न्यायालय के अनुसार जिस अस्पताल में मरीज भर्ती है, वहां मेडिकल बोर्ड का गठन होगा और अगर वह बोर्ड यूथेनेशिया से सहमत होगा तो रिपोर्ट कलेक्टर को भेजेगा। कलेक्टर मुख्य जिला मेडिकल ऑफिसर की अगुआई में मेडिकल बोर्ड का गठन कर मरीज का परीक्षण करेगा।

यूथेनेशिया की अनुमति

अगर जिला मेडिकल बोर्ड भी अस्पताल से सहमति रखेगा तो मामले को प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को रेफर कर देगा। अगर इस स्थिति में भी यूथेनेशिया की अनुमति नहीं मिलती है तो मरीज के रिश्तेदार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। फिर हाई कोर्ट तीन डॉक्टरों का पैनल गठित कर मामला का परीक्षण करवाएगा और इसके बाद फैसला लिया जाएगा। भारत में अरुणा शानबाग इच्छामृत्यु पर बहस का सबसे बड़ी चेहरा बनी थीं, जिनकी 42 वर्ष तक निष्क्रिय रहने के बाद मई 2015 में मृत्यु हो गई।

कई देशों में इच्छामृत्यु को आज भी मानते हैं हत्या

ब्रिटेन समेत यूरोप के कई बड़े देश इच्छामृत्यु को आज भी हत्या मानते हैं। लेकिन नीदरलैंड, बेल्जियम, कोलंबिया और पश्चिम यूरोप के लग्जमबर्ग में इच्छा मृत्यु की अनुमति है। वर्ष 2015 में अमेरिका के कैलिफोर्निया ने भी वाशिंगटन, ओरेगन राज्यों की तरह इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। सालों चली बहस के बाद 2016 में कनाडा ने भी इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। सवाल यह भी उठता है कि इच्छा मृत्यु की वसीयत क्या जायदाद की वसीयत की तरह होनी चाहिए जिसमें लोग जितनी बार भी चाहे बदलाव कर सकें। इसकेअतिरिक्त मरीज के वसीयत के प्रमाणिकता पर भी सवाल उठ सकते हैं? क्या वसीयत में कोई यह भी घोषणा कर सकता है कि उसे कदापि इच्छामृत्यु नहीं चाहिए?

बुजुर्गो को बोझ मानने की प्रवृत्ति

भारत में जिस तरह मध्यवर्ग में बुजुर्गो को बोझ मानने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, वैसे में इसके दुरुपयोग होने की प्रबल संभावना है। लिहाजा इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए पूर्ण सावधानी की आवश्यकता होगी। अंतत: मरणासन्न पड़े या असहनीय दर्द ङोल रहे लाइलाज बीमारियों से पीड़ित मरीजों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लाभ मिलेगा, लेकिन इसके क्रियान्वयन पक्ष और नैतिक पक्ष पर बहस जारी रहेगी। 

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Posted By: Kamal Verma

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