जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। तीसरी लहर में वैक्सीन लोगों की जान और माल दोनों बचाने में सफल साबित हो रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार दूसरी लहर के दौरान कम टीकाकरण के कारण बड़ी संख्या में संक्रमितों को जान से धान धोना पड़ा था। यही नहीं, अस्पताल में भर्ती होने की मजबूरी संक्रमितों के लिए बड़ी मुसीबत साबित हुई थी। लेकिन 72 फीसद से अधिक व्यस्क आबादी के टीकाकरण के कारण तीसरी लहर में बहुत कम संक्रमितों को अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ रही है, साथ ही उनकी मृत्युदर भी काफी कम है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने दूसरी और तीसरी लहर में संक्रमण के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि एक अप्रैल को संक्रमितों की संख्या 72,330 से बढ़कर 30 अप्रैल को 3,46,452 तक पहुंच गई। उस दिन सक्रिय मरीजों की संख्या 31,70,228 थी। इसी के अनुरूप एक दिन में संक्रमण के कारण मरने वालों का साप्ताहिक औसत 319 से बढ़कर 30 अप्रैल को 3059 पहुंच गया।

जनवरी 2022 तक 72 फीसद आबादी को दोनों डोज दिया जा चुका

इसकी तुलना तीसरी लहर से करें तो संक्रमितों की संख्या एक जनवरी को 22,775 से बढ़कर 20 जनवरी को 3,17,532 पहुंच गई। 20 जनवरी को देश में सक्रिय मरीजों की संख्या 19,24,051 थी। लेकिन इस दौरान प्रतिदिन मरने वालों का साप्ताहिक औसत दूसरी लहर की तुलना में काफी कम रहा। एक जनवरी को औसतन 281 संक्रमितों की मौत हो रही थी, जबकि 20 जनवरी को 380 संक्रमितों की मौत हुई। मौतों में इस अंतर की मूल वजह टीकाकरण को बताते हुए राजेश भूषण ने कहा कि अप्रैल तक केवल दो फीसद व्यस्क आबादी को टीके का दोनों डोज दिया गया था, जबकि जनवरी में 72 फीसद आबादी को दोनों डोज दिया जा चुका है।

राजेश भूषण के अनुसार 15 से 18 साल के 52 फीसद किशोरों को टीके की एक डोज लग चुकी है। इसके साथ ही हेल्थ केयर वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स और गंभीर बीमारी से ग्रस्त 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को सतर्कता डोज लगाने का काम तेजी हो रहा है। उन्होंने बचे हुए लोगों को जल्द से जल्द टीका लेने की अपील की।

वैक्सीन के चलते अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत भी कम पड़ रही

राजेश भूषण के अनुसार वैक्सीन न सिर्फ संक्रमितों की जान बचाने में सफल हो रहा है, बल्कि इसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत भी कम पड़ रही है। दिल्ली में संक्रमण की दर, संक्रमितों की संख्या और अस्पताल में भर्ती संक्रमितों का आंकड़ा पेश करते हुए उन्होंने कहा कि 99 फीसद संक्रमितों में कपकपी या बिना कपकपी के बुखार, गले में खरास और खांसी के लक्षण देखे जा रहे हैं, जो पांच दिन में ठीक भी ही जा रहे हैं।

वहीं, कुछ संक्रमितों में की मांसपेशियों में कमजोरी और थकान की शिकायत भी आ रही है। इस कारण बहुत कम लोगों को अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ रही है। उन्होंने कहा कि दूसरी लहर में संक्रमण दर बढ़ने के साथ ही अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी साफ देखी जा सकती थी, लेकिन तीसरी लहर में संक्रमण दर तेजी से बढ़ने के बावजूद अस्पताल में बहुत मरीज भर्ती हो रहे हैं।

बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने की नहीं पड़ रही है जरूरत

राजेश भूषण ने तीसरी लहर में बच्चों के अधिक संक्रमित होने के दावों का खंडन किया। बच्चों के संक्रमण का सालाना आंकड़ा पेश करते हुए उन्होंने कहा कि 2020 में कुल संक्रमितों में से 10 फीसद 0-19 साल आयुवर्ग के थे और कुल मौतों में उनका अनुपात 0.96 फीसद था। 2021 में कुल संक्रमितों में 11 फीसद इस आयुवर्ग के थे और कुल मौतों में उनका अनुपात 0.70 फीसद रहा। उनका कहना था कि पहली और दूसरी लहर में बच्चों के संक्रमण और मौतों में कोई ज्यादा अंतर देखने को नहीं मिला है। तीसरी लहर में दिल्ली के आंकड़ों के आधार पर उन्होंने बताया कि 11 से 18 साल के बच्चों में सामान्य रूप से बुखार के लक्षण ही देखे जा रहे हैं। उनमें भी संक्रमण उनके ऊपरी श्वसन प्रणाली में देखा जा रहा है, फेफड़ों तक नहीं पहुंच रहा है। जाहिर है उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं पड़ रही है। 

Edited By: Dhyanendra Singh Chauhan