सुधीर पांडेय, चाईबासा। हो आदिवासियों का पारंपरिक भोजन लड गिल्लू या पत्ता चिकन आज हर किसी की जुबां पर चढ़ रहा है। चाईबासा में साल के पत्ते में साल के पेड़ के नीचे बनने वाले इस व्यंजन को बनते देखना जितना मजेदार है, खाने में उतना ही स्वादिष्ट। इसके अलावा यह सेहत के लिए भी फायदेमंद है। आदिवासी घरों से निकलकर यह चाईबासा की सड़कों के किनारे खूब बिक रहा है। स्थानीय लोग तो इसके मुरीद हैं ही, बाहर से आने वाले लोगों की जुबां पर भी इसका स्वाद चढ़ गया है। साल के पत्ते में बनने के साथ ही यह उसी में परोसा भी जाता है। 20 से 30 रुपये में एक पत्ता चिकन और उसके साथ चावल। पहले चाईबासा में दो-तीन लोग ही यह व्यंजन बेचते थे। इसकी डिमांड को देखते हुए अब यह कई जगह मिलने लगा है।

पत्ते में बांधकर धीमी आंच में पकाते हैं

झारखंड के चाईबासा के सिकुरसाई में एक पेड़ के नीचे इस व्यंजन को तैयार कर रहे जयधर पाड़ेया बताते हैं कि इसे बनाना बहुत ही सरल है। हम लोग पहले एक बड़े बर्तन में चिकन के छोटे-छोटे पीस रखते हैं। इसमें बहुत ही कम मात्रा में तेल और मसाले को अच्छे से मिलाकर रख दिया जाता है। इसके बाद भीगे हुए चावल को भी अच्छे से मिलाया जाता है। फिर साल के पत्ते में सारी सामग्री धागे से बांधकर लकड़ी की आग में धीमे-धीमे पकाते हैं। 15 से 20 मिनट में यह तैयार हो जाता है। इस व्यवसाय से जुड़े ताम्बो चौक के सिपाई बिरुवा ने बताया कि चाईबासा में इसकी डिमांड बढ़ रही है। लोग इस व्यंजन को काफी पसंद कर रहे हैं। हो समाज के ही भूषण पाट कहते हैं कि साल के पत्ते में पकने के कारण पत्ता उसका सारा तेल और मसाला सोख लेता है। फिर यह उबले व्यंजन की खूबी वाला बन जाता है, लेकिन स्वाद भरपूर होता है। यह सेहत के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं है। चाईबासा में साल के पेड़ भरे पड़े हैं। ऐसे में इसे बनाने के लिए यह मुफीद जगह है। लड गिल्लू आपको चाईबासा में ही मिलेगा।

कभी अपने पूर्वजों को करते थे अर्पित

आदिवासी हो समाज महासभा के मुकेश बिरुवा के अनुसार, साल का पत्ता हमारे विधि-विधान से जुड़ा हुआ है। किसी भी तरह के अच्छे काम में साल के पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, लड गिल्लू को हम लोग पहले अपने पूर्वजों को अर्पित करने के लिए पकाते थे। वो पूरी तरह शुद्ध होता है। बलि वाले मुर्गा का मांस, हल्दी, मिर्च और नमक के साथ गीले चावल को मिलाकर इसे तैयार किया जाता था। पूर्वजों को अर्पित करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। आज इसे व्यावसायिक इस्तेमाल में लाया जा रहा है। इसे प्रचारित करने के लिए आने वाले दिनों में लगने वाले आदिवासी फूड फेस्टिवल में इसे रखा जाएगा।

सर्दी के मौसम में खाने में आता है आनंद

जमशेदपुर से चाईबासा स्थित कोल्हान विवि में काम से आए इंजीनियरिंग के छात्र सौरभ सिंह ने पत्ता चिकन खाते हुए कहा कि यह एक प्रकार की देसी बिरयानी है। मजेदार है। बारिश और सर्द मौसम में इसे खाने का अपना ही आनंद है। साल के पत्ते में धीमी आंच में पकने के कारण यह बहुत ही लजीज बन जाता है। मैं अक्सर इसे खाने आता हूं। सेहत के प्रति सतर्क, लेकिन स्वाद के शौकीन लोगों को इसे जरूर चखना चाहिए।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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