रीतेश पांडेय, जगदलपुर। समाज के हर तबके में बराबरी यानी साम्यवाद की बात कहने वाले नक्सली खुद ही इसका पालन नहीं करते हैं। बड़े नेता जंगल में शान ओ शौकत से रहते हैं। निचले कैडर के गुरिल्लाओं को इस्तेमाल के लिए सस्ते जूते और घटिया सामान देते हैं, जबकि खुद ब्रांडेड जूते और महंगी चीजों का उपयोग करते हैं। कोरोना जैसी महामारी के इलाज में भी भेदभाव बरता जाता है।

निचले कैडर को नहीं देते बराबरी का हक व सुविधाएं, आदिवासियों का करते इस्तेमाल

बड़े नेताओं को इलाज के लिए बेहतर सुविधा मिलती है जबकि निचले कैडर को बीमारी से जूझने के लिए छोड़ दिया जाता है। नक्सली नेताओं का यह भेदभाव बीते शुक्रवार को छत्तीसगढ़ व ओडिशा सीमा पर चांदामेटा में हुई मुठभेड़ के बाद नक्सील कैंप से बरामद सामान से यह बात उजागर हुई है। पुलिस को यहां ब्रांडेड कंपनियों के जूते, फिल्टर वाटर, हर्बल साबुन व अन्य सामान मिले हैं। इससे साम्यवाद के नाम से झंडाबरदारी करने वाले नक्सलियों की कथनी और करनी का अंतर साफ होता है।

पहली पंक्ति के नक्सल लीडर भौतिक सुख-सुविधाओं में रहते हैं लिप्त

शुक्रवार को सुकमा जिले के तुलसीडोंगरी से पहले चांदामेटा के जंगल में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में एक महिला नक्सली मारी गई थी। इस दौरान मौके की तलाशी में पुलिस ने एके-47, इंसास, पिस्टल समेत ब्रांडेड हर्बल उत्पाद, साबुन, टूथपेस्ट, शैम्पू, ब्रांडेड मिनरल वाटर, जूते आदि बरामद किए। नक्सल मामलों के जानकारों के अनुसार नक्सली नेता पूंजीवाद का विरोध व साम्यवाद की वकालत भोली जनता को महज क्रांति की घुट्टी पिलाने के लिए करते हैं।

असल में पहली पंक्ति के नक्सल लीडर भौतिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हैं। इसके विपरीत बस्तर के स्थानीय लड़ाकों को न्यूनतम सुविधाएं ही मुहैया करवाते हैं। बता दें, स्थानीय आदिवासी युवक नक्सल संगठन में एरिया कमेटी से ऊपर प्रमोट नहीं किए जाते। केंद्रीय नेतृत्व में केवल आंध्र, तेलंगाना व अन्य राज्यों के ही नक्सली हैं।

Edited By: Arun Kumar Singh