यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 05, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
आधी दुनिया का पूरा सच: पैरों पर खड़ी नारी, रफ्तार पकड़ना बाकी
शायद भारत की प्रगति का पारा इसीलिए नहीं चढ़ रहा, क्योंकि यहां महिलाओं की सुरक्षा अभी भी चिंता का विषय है। सुरक्षा पूरी मिले तो भागीदारी भी पूरी होगी।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। भारत में देश की सुरक्षा और विदेशी कूटनीति दोनों इस समय महिलाओं के हाथ में है। यह दृश्य हौसला बढ़ाता है। यूं तो महिलाओं की प्रगति को लेकर हर सरकार ने कदम बढ़ाए, लेकिन पिछले तीन साल में नारी सशक्तीकरण की दो दजर्न से ज्यादा योजनाएं जमीन पर उतरी हैं। पर सोच बदलना बाकी है। सुरक्षा की कमी महिला विकास के रफ्तार को रोक रही है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी राष्ट्र की प्रगति का थर्मामीटर उसका अपनी महिलाओं के प्रति व्यवहार होता है। शायद भारत की प्रगति का पारा इसीलिए नहीं चढ़ रहा, क्योंकि यहां महिलाओं की सुरक्षा अभी भी चिंता का विषय है। मोदी सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को एक सामाजिक आंदोलन बना कर बेटियों का जन्म सुनिश्चित करने में काफी हद तक सफलता पायी है, लेकिन उनकी सुरक्षा अभी भी सवालों में हैं क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के प्रति अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है।
सरकार बेटियों को कोख में मारने की प्रवत्ति रोकने में काफी हद तक सफल रही है। नतीजे सकारात्मक हैं, जहां लड़कियों का अनुपात सबसे खराब था, वहां उनकी संख्या बढ़ने लगी है। मगर आंकड़ों में उन जिलों की हकीकत भी बयां हो रही है जहां अनुपात अच्छा था लेकिन अब गिर गया है। सबसे खराब स्थिति ममता बनर्जी के राज्य में कोलकाता की है। उत्तराखंड के देहरादून में भी लिंगानुपात में चौकाने वाली गिरावट आयी है। लड़कियों को जन्म देने के प्रति उदासीनता में उनकी सुरक्षा एक बड़ा कारण है।
राष्ट्रीय क्त्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 2015 के आंकड़े बताते हैं कि 2011 से 2015 तक महिलाओँ के प्रति अपराधों में 43 फीसद की वृद्धि हुई। जबकि एक दशक (2005 से 2015) के बीच महिलाओं के प्रति अपराधों में 110.5 फीसद की वृद्धि हुई। 2015 में महिलाओं के प्रति कुल अपराध 53.9 फीसद दर्ज हुए जिसमें दिल्ली सबसे ऊपर थी।
अच्छी बात यह है कि सोलह साल बाद राष्ट्रीय महिला नीति संशोधित हो रही है। नयी नीति में महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं पोषण को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही शिक्षा, आर्थिक सक्षमता, प्रशासन और निर्णय लेना तथा महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने को भी शामिल किया गया है। नीति तैयार है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद लागू होगी। अकेली महिला को कभी तरजीह नहीं मिली पहली बार सिंगल वोमेन का ध्यान रखा गया है।
नियमों में बदलाव हुआ और अब पासपोर्ट में न तो पति का नाम लिखना अनिवार्य रह गया है और न ही पिता का। शादी या तलाक का प्रमाणपत्र लगाना भी जरूरी नहीं है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण को लेकर भी कवायद दिख रही है। पर सारे प्रयास बिना सुरक्षा के अधूरे हो सकते हैं।
टाॅप के पांच जिले जहां लड़कियों का अनुपात सुधरा है,
प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 2014 और अब
उत्तरी सिक्कम 2014 में 831 और अब 1009
करनाल - 2014 में 758 अब 884
मिजोरम का एक जिला 2014 में 915 अब 1022
कुदालौर - 2014 में 856 अब 957
गाजियाबाद - 2014 899 अब 977
टाॅप के पांच जिले जहां लड़कियों का अनुपात खराब हुआ
इटावा - 2014 मं 953 अब 916
फरुखाबाद - 2014 913 अब 876
सहारनपुर - 2014 में 954 अब 913
एटा - 2014 में 984 अब 942
बिजनौर - 2014 में 944 अब 894
महिलाओं की सुरक्षा के इंतजाम
- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
- वन स्टाप सेंटर
- पूरे देश में वोमेन हेल्प लाइन का एक नबंर 181 जारी होना
- मोबाइल फोन पर पेनिक बटन
- महिला पुलिस वालेन्टियर
- कार्य् स्थल पर महिलाओ का यौन शोषण रोकने का कानून लागू करना
- मानव तस्करी रोकने के लिए कानून
यह भी पढ़ें: रक्षा मंत्री ने भारतीय सेना में सुधार प्रक्रिया लागू करने की समीक्षा की
