नई दिल्ली, [माला दीक्षित]। देश के कुछ क्षेत्रों में जैन पर्व पर्युषण के दौरान मांस बिक्री पर लगी रोक का भारी विरोध हो रहा है। अधिकारों की दुहाई देकर लोग अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं। बांबे हाई कोर्ट ने तो सोमवार को मुंबई में लगी रोक हटा भी दी, लेकिन कानून और अधिकार का जो मसला आज उठ रहा है, उसे सुप्रीम कोर्ट सात साल पहले ही निपटा चुका है। वह पर्युषण पर्व पर गुजरात में नौ दिन के लिए मांस बिक्री पर लगी रोक को सही ठहरा चुका है। कोर्ट ने तब कहा था कि मांस बिक्री पर कुछ दिन की रोक से मौलिक अधिकार का हनन नहीं होता। किसी समुदाय की भावनाओं का खयाल करके ऐसी रोक को अतार्किक नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस एचके सेमा और जस्टिस मार्कंडेय काटजू की पीठ ने 2008 में दिए फैसले में भारतीय समाज की विविधिता का जिक्र करते हुए मुगल सम्राट अकबर और अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सहिष्णुता का उदाहरण दिया था। पीठ ने कहा था कि वे ये उदाहरण इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि देश में लगातार असहिष्णुता की प्रवृत्ति बढ़ रही है। बहु-विविधता वाले हमारे देश में किसी समुदाय विशेष की भावनाओं का खयाल रखते हुए थोड़े समय के लिए लगे प्रतिबंध पर किसी को न तो जरूरत से ज्यादा संवेदनशील होना और न ही बुरा मानना चाहिए। जब सम्राट अकबर अपनी हिंदू पत्नी और हिंदू भारतीयों के लिए कुछ दिन मांस छोड़ सकते हैं तो हमें भी उसी तरह दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए, चाहें वे अल्पसंख्यक ही क्यों न हों।

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यह पहला मौका नहीं था जब कोर्ट ने विशेष दिनों पर मांस बिक्री की रोक को सही ठहराया हो। इससे पहले 1986 में म्यूनिसिपल कारपोरेशन बनाम जान मुहम्मद मामले में दिए फैसले में शीर्ष न्यायालय ने सात दिन के लिए महात्मा गांधी के जन्मदिन, पुण्यतिथि 30 जनवरी, महावीर जयंती, जन्माष्टमी, रामनवमी आदि दिनों पर कारपोरेशन के बूचडख़ानों की बंदी को सही ठहराया था। पर्युषण पर्व पर बंदी को सही ठहराने वाले फैसले में कोर्ट ने इसका हवाला भी दिया है। कोर्ट ने कहा था कि कुछ दिन प्रतिबंध से व्यवसाय की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन नहीं होता। कोर्ट ने यहां तक कहा था कि मांसाहारी लोग भी कुछ दिन के लिए शाकाहारी हो सकते हैं।

फैसला लिखने वाले जस्टिस काटजू ने संविधान पीठ के एक पूर्व फैसले का हवाला दिया है। इसमें कोर्ट ने कहा था कि संविधान सबके लिए है लेकिन अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को ठीक लगता है तो वे प्रतिबंध लगा सकते हैं। हाल ही में जस्टिस काटजू ने इस मुद्दे पर अपने ब्लाग में लिखा और हिंसा विरोधक संघ के इस फैसले का जिक्र भी किया। हालांकि बदली परिस्थितियों में वह स्वयं प्रतिबंध को लेकर दुविधा में नजर आते हैं।

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Posted By: Rajesh Niranjan

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