साइबा गुप्ता/नितिन बस्सी। देश में तमाम नदियों की स्वच्छता सवालों के घेरे में है। बीते दिनों झाग और इसे खत्म करने के लिए डाले गए केमिकल्स के कारण यमुना नदी का प्रदूषण काफी चर्चा में रहा था। लेकिन महज ऐसी छिटपुट चर्चाओं से यमुना या दूसरी नदियों को स्वच्छ बना पाना संभव नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि इन्हें प्रदूषित करने वाले विभिन्न स्रोतों, खास तौर पर शहरी अपशिष्ट जल, को इनमें मिलने से रोका जाए।

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अनुसार, इस साल मानसून में यमुना के पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा लगभग शून्य (निल) थी। इसके अलावा, दिल्ली शहर की सीमा पार करने पर यमुना के पानी में मल कोलीफॉर्म की मात्रा बहुत ज्यादा (स्वीकार्य सीमा से लगभग 1,700 गुना ज्यादा) पाई गई थी। मल कोलीफॉर्म, अनुपचारित अपशिष्ट जल में मिलता है। सिर्फ यमुना ही नहीं, शहरी क्षेत्रों से गुजरने वाली दूसरी नदियों की स्थिति भी इससे अलग नहीं हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने देश भर में नदियों के 351 प्रदूषित हिस्सों को चिन्हित किया है, जिसमें बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (पानी में मल व जैविक प्रदूषण होने का एक संकेतक) तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा मिली थी। इसका मुख्य कारण आंशिक रूप से उपचारित या अनुपचारित शहरी अपशिष्ट जल का इन नदियों में मिलना है।

भारत के विभिन्न शहरों से प्रतिदिन 72,368 मिलियन लीटर (एमएलडी) अपशिष्ट जल निकलता है। लेकिन इसका सिर्फ 28 प्रतिशत हिस्सा ही उपचारित (ट्रीटमेंट) हो पाता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अपनी पूरी क्षमता पर काम नहीं करते हैं, अपशिष्ट जल के गुणवत्ता मानकों को भी पूरा नहीं किया जाता है, या अनधिकृत कॉलोनियों व उप-नगरों के अपशिष्ट जल को छोड़ दिया जाता है।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक विश्लेषण के अनुसार, भारत में वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट का नजरिया बदलने की जरूरत है। ‘यूज एंड थ्रो’ की जगह पर ‘यूज, ट्रीट और रियूज’ का दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, ताकि अपशिष्ट जल की मात्रा को न्यूनतम किया जा सके। यह उपचारित अपशिष्ट जल से पोषक तत्व और पानी जैसे संसाधनों को हासिल करते हुए वित्तीय लाभों के लिए रास्ते खोलने वाला है। अभी भारतीय शहरी क्षेत्रों में उपचारित अपशिष्ट जल का इस्तेमाल बहुत सीमित है। चेन्नई में 49 प्रतिशत, दिल्ली में 19 प्रतिशत और हैदराबाद में सिर्फ 6 प्रतिशत उपचारित अपशिष्ट जल ही दोबारा इस्तेमाल हो पाता है।

लेकिन कई उप-नगरीय क्षेत्रों में अनुपचारित अपशिष्ट जल को सब्जियां की सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है। यह किसानों के लिए लाभकारी होता है, क्योंकि उर्वरकों का खर्च घट जाता है। लेकिन यह त्वचा रोगों जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों और मिट्टी खराब होने जैसी दीर्घकालिक समस्याओं का जोखिम पैदा करता है। हालांकि, इसके लिए उपचारित अपशिष्ट जल के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर इन समस्याओं के समाधान के साथ-साथ नदी जल की गुणवत्ता को भी सुधारा जा सकता है। इससे वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट में सर्कुलेरिटी लाने यानी अपशिष्ट जल की मात्रा को न्यूनतम स्तर तक घटाने में भी मदद मिलेगी। लेकिन इसके लिए इन कदमों को उठाने की जरूरत है।

पहला, भारत में वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट बढ़ाने के लिए एक नेशनल पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करने की जरूरत है। अभी कुछ राज्यों में ही उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल संबंधी नीति है, जबकि राष्ट्रीय स्तर ऐसा कोई व्यापक कानूनी और संस्थागत ढांचा मौजूद नहीं है। इसके अलावा, जिन राज्यों में उपचारित अपशिष्ट जल के उपयोग की नीति है, वह इसके गुणवत्ता मानकों और विशेष उपयोगों के लिए आवंटन की शर्तों को परिभाषित नहीं करती है। इसलिए, नेशनल पॉलिसी फ्रेमवर्क इस कमी को दूर करने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकता है। अपशिष्ट जल के उपचार और दोबारा उपयोग को मुख्यधारा में लाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच संस्थागत समन्वय को मजबूत करने की जरूरत है।

दूसरा, उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा उपयोग संबंधी परियोजनाओं के निर्माण के लिए उपयुक्त लोक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इसके लिए स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन के तहत प्रोत्साहित मॉडल्स देखे जाने चाहिए। उपचारित अपशिष्ट जल के संभावित उपयोगों के अनुरूप तकनीक को अपनाते हुए इन परियोजनाओं को वित्तीय रूप से कारगर बनाया जा सकता है, जैसे- उप-शहरी क्षेत्रों में सब्जियां उगाने के लिए उपचारित अपशिष्ट जल की आपूर्ति करते हुए आय पैदा की जा सकती है।

तीसरा, कम लागत वाली प्रकृति-आधारित अपशिष्ट जल उपचार तकनीक को अपनाना चाहिए। अपशिष्ट जल को जमा करने वाले तालाबों को बढ़ावा देना चाहिए। इसमें इलेक्ट्रोमैकेनिकल तकनीक की तुलना में ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ती है, इसलिए इसे छोटे शहरों में अपनाया जा सकता है, जहां जनसंख्या घनत्व कम और नये बुनियादी ढांचे के लिए मांग सीमित है। कम ऊर्जा खपत के कारण इसका कार्बन फुटप्रिंट भी कम होता है।

चौथा, उपचारित अपशिष्ट जल की मांग को बढ़ाने के लिए ताजे पानी की कीमत तय करना भी जरूरी है। दिल्ली और हैदराबाद जैसे कई शहरों में घरेलू पानी या तो मुफ्त या फिर अत्यधिक सब्सिडी पर दिया जाता है। इससे उन क्षेत्रों में भी उपचारित अपशिष्ट जल की कोई मांग पैदा नहीं हो पाती, जहां पानी की किल्लत होती है। इसलिए बागीचों की सिंचाई, होटलों व अस्पतालों में पेयजल से हटकर अन्य उपयोगों, और प्रदूषण नियंत्रण के लिए एंटी-स्मॉग गन से पानी के छिड़काव करने जैसे कार्यों के लिए उपयोग के आधार पर ताजे पानी की कीमत तय की जा सकती है। इससे इन कार्यों के लिए उपचारित अपशिष्ट जल की संस्थागत मांग पैदा करने में मदद मिलेगी।

शहरी अपशिष्ट जल के उपचार और दोबारा इस्तेमाल करने की दूसरी संभावनाएं भी काफी व्यापक हैं। उदाहरण के लिए, देश में अपशिष्ट जल के उपचार की वर्तमान क्षमता और सिंचाई के लिए पानी की मौजूदा मांग के आधार पर एक त्वरित अनुमान बताता है कि अभी उपचारित होने वाले अपशिष्ट जल की कुल मात्रा दिल्ली से लगभग सात गुना बड़े क्षेत्र की सिंचाई के लिए पर्याप्त है। देश में अपशिष्ट जल अभी बहुत कम उपयोग होने वाला संसाधन है। लेकिन उचित प्रबंधन होने पर यह ताजे पानी की कमी दूर करने और जलीय पर्यावरण को सुधारने, खास तौर पर नदियों का प्रदूषण घटाने, जैसे अवसर देता है।

(साइबा गुप्ता, रिसर्च एनालिस्ट और नितिन बस्सी, प्रोग्राम लीड, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) से जुड़े हैं।)

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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