नई दिल्ली (जेएनएन)। गृहयुद्ध से जूझ रहा सीरिया पड़ोसी और पश्चिमी देशों की लड़ाई का अड्डा बना हुआ है। सबके अपने-अपने हित हैं। अमेरिका अपना प्रभाव क्षेत्र कम नहीं करना चाहता है तो रूस खुद को दोबारा शक्ति के रूप में स्थापित करने में लगा है। ईरान, सऊदी अरब और इजरायल की अपनी लड़ाई है। बीते सात वर्षों में इस लड़ाई में सीरिया में तीन लाख से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा दी है, वहीं 50 लाख से ज्यादा लोगों को देश छोड़ना पड़ा है। जानिये इस युद्ध में किसकी क्या भूमिका और उसका क्या हित है:

असद सरकार
सुन्नी बाहुल्य सीरिया के शिया राष्ट्रपति बशर अलअसद के खिलाफ विद्रोह है। वे इसे दबाने में लगे हैं। इस काम में असद की मदद रूस और ईरान कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि वे इसमें कामयाब होंगे। असद अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के नाम पर विद्रोहियों पर हमले कर रहे हैं। उन पर अपनी ही जनता पर रासायनिक हथियारों से हमले करने का आरोप है, जिसे वे नकारने में लगे हैं।

रूस: व्लादिमीर पुतिन
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूस को एक बार फिर अमेरिका के समकक्ष शक्तिशाली देश के रूप में खड़ा करना चाहते हैं। वह शुरू से ही सीरिया के असद सरकार के साथ हैं। इस लड़ाई में वे किसी भी हाल में हारना नहीं चाहते हैं। अगर असद को अमेरिका अपदस्थ कर देता है तो पुतिन की बड़ी हार होगी और रूस में उनकी स्थिति कमजोर होगी। असद की सेनाओं को उसने हथियार मुहैया कराये हैं। यह जरूर है कि वह अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों से सीधे टकराव नहीं चाहते।

ईरान

ईरान शिया बाहुल्य देश है। उसकी सऊदी अरब से वर्चस्व की लड़ाई है। वहीं इजराइल के साथ उसके रिश्ते भी बेहद तल्ख हैं। इस स्थिति में तेहरान नहीं चाहता है कि सीरिया में शिया सरकार का पतन हो। वह असद की सेनाओं को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ हथियार भी मुहैया करा रहा है। सीरिया में शिया राष्ट्रपति असद के समर्थन में विद्रोहियों पर हमले कर रहा है। ईरान को यह भी डर है कि सीरिया के बाद अमेरिका गठबंधन का अगला निशाना वह भी है।

अमेरिका
अमेरिका शुरू से ही असद विद्रोहियों के साथ है। वह हर हाल में विश्व नेता का ताज खोना नहीं चाहता। वह इस्लामिक स्टेट आतंकियों के खत्म करने के नाम पर असद समर्थित सेनाओं पर हमले भी करता है। वह इजरायल, सऊदी अरब, मिस्र, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ मिलकर असद को हटाने में लगा हुआ है। पश्चिम एशिया में रूस और ईरान की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए उसकी सीरिया में दिलचस्पी ज्यादा बढ़ गई है।

इजरायल
इस देश ने काफी समय तक सीरिया के मामले से खुद को अलग रखा, लेकिन सीरिया में ईरान के प्रभाव की वजह से वह डरा हुआ है। इसलिए वह सीरिया में हमले कर रहा है। अगर सीरिया में ईरान कामयाब हो जाता है तो इजरायल के लिए यह बड़ा झटका होगा। इसे डर है कि सीरिया में ईरान के प्रभाव की वजह से लेबनान में उसके सबसे बड़े दुश्मन हिजबुल्ला को मजबूती मिली है। इसलिए वह सीरिया में बफर जोन के तौर पर देख रहा है। वह अमेरिका और रूस से ईरान को लेकर आश्वासन चाहता है।

फ्रांस
हमेशा से ही रासायनिक हथियारों के विरोध में रहा है। दूसरा इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से उसे सीधे खतरा है। हर हाल में वह आइएस का विस्तार रोकना चाहता है। ब्रिटेन की तरह फ्रांस भी एक बड़ी ताकत है। लिहाजा ऐसे अभियानों में उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

तुर्की
तुर्की की सीमा सीरिया से सटी है। वहां की हर हलचल का असर तुर्की में दिखता है। तुर्की सीरिया की असद सरकार को पसंद नहीं करता। इस्लामिक स्टेट को भी बर्दाश्त नहीं करता। उसे यह डर भी है कि उसकी सीमा से लगे सीरिया में कुर्द लड़ाके मजबूत न हो जाएं। सीरिया के आफरीन में तुर्की ने कुर्द संगठन वीआइपीजी के खिलाफ हवाई हमले भी किए थे।

ब्रिटेन
इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका के साथ है। संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य होने के नाते वह इस भूमिका में है। 2014 में दमिश्क के पूर्वी भाग में रासायनिक हमले के बाद उसने हमले का मन बनाया था, लेकिन ब्रिटेन की संसद में यह प्रस्ताव गिर गया। इस बार रासायनिक हमले के बाद उसने अमेरिका के साथ हमले शुरू कर दिए।

सऊदी अरब
सऊदी अरब सुन्नी बाहुल्य देश है। वह अरब जगह में सुन्नी देशों के अगुवा बनने और खुद को प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। शिया राष्ट्र ईरान से उसकी सीधी तकरार है। राष्ट्रपति असद शिया हैं और उन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है। यही वजह है कि सऊदी अरब असद का तख्तापलट करके अपने समर्थन वाली सरकार को काबिज कराना चाहता है।  

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By Sanjay Pokhriyal