जागरण संवाददाता, नई दिल्ली । चार सौ साल पुरानी दिल्ली की जामा मस्जिद शनिवार को अपने 14वें नायब शाही इमाम सैयद शाबान बुखारी की दस्तारबंदी की गवाह बनी। रंग-बिरंगी लाइट व फूलों से सजी मस्जिद में सऊदी अरब, ईरान व देश के कई उलमाओं, आलिम, धर्मगुरुओं समेत अन्य लोगों ने हिस्सा लिया। परंपरा के मुताबिक दस्तारबंदी के बाद सात गोले छोड़े गए। इबादत व शेरों-शायरी के बीच उलमाओं ने कहा कि दस्तारबंदी हिंदुस्तान के इतिहास में नई तारीख लिखेगी। परंपरा के मुताबिक, दस्तारबंदी की रस्म के बाद सात गोले छोड़े गए।

शाबान की ताजपोशी पर उठ रहे सवालों पर भी जवाब देते हुए कहा गया कि जो वक्फ बोर्ड अपनी जायदाद पर कब्जा नहीं रोक पा रहा, वह मस्जिदों में कैसे दखल कर सकता है? कार्यक्रम में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। शाम 5.25 बजे मगरिब की नमाज के साथ जामा मस्जिद दिल्ली फाउंडेशन ट्रस्ट के बैनर तले कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस अवसर पर उलमा के. शाहिद रजा ने मंच संचालन किया। ईरान से आए कारी सैयद अली रजा व रामपुर के कारी अतीकउल्लाह ने कुरान की तिलावत पढ़ी। फिर जब शायर अजहर इनायती ने सर न हो कि होठों पर नाम ए नबी न हों। जो सांस ले रहें हों, कहीं आखिरी न हों.. पेश किया तो मस्जिद परिसर में मौजद लोग वाह-वाह कर उठे। शाम 7.02 बजे सैयद अहमद बुखारी ने मंच पर शाबान बुखारी को नायब शाही इमाम बनाए जाने का ऐलान करते हुए उनकी दस्तारबंदी रीतिरिवाज के साथ की। दस्तारबंदी के बाद नायब शाही इमाम सैयद शाबान बुखारी अपने पिता का माथा चूमते हुए आगे बढ़े और मंच से सबका धन्यवाद देते हुए खुदा से इस जिम्मेदारी को निभाने का हौसला मांगा।

पूर्वजों का किस्सा सुनाया

उन्होंने जामा मस्जिद व अपने

खानदान के इतिहास के बारे में बताया कि छह अक्टूबर 1650 को पहाड़ की चट्टानों पर शाहजहां ने अपने हाथों से जामा मस्जिद की बुनियाद रखी थी। पहले शाही इमाम सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी थे। मुगल बादशाहों की ताजपोशी शाही इमाम करते थे। 25 नवंबर को आम लोगों व 29 नवंबर को देश-विदेश से आने वाले मेहमानों के लिए रात्रिभोज का कार्यक्रम रखा गया है।

Posted By: Bhupendra Singh