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Solar Eclipse 2023: भारत में कब है सूर्य ग्रहण, जानिए समय और तारीख; कैसे बचे नेगेटिव एनर्जी से

Surya Grahan 2023 April साल 2023 का पहला सूर्य ग्रहण (First solar eclipse of the year 2023) 20 अप्रैल को लगने जा रहा है। इस साल वैशाख अमावस्या पर एक ही दिन में तीन तरह के सूर्य ग्रहण दिखेंगे जिसे वैज्ञानिकों ने हाइब्रिड सूर्य ग्रहण कहा है।

By Jagran NewsEdited By: Versha SinghPublished: Wed, 19 Apr 2023 09:54 AM (IST)Updated: Wed, 19 Apr 2023 09:54 AM (IST)
भारत में कब है सूर्य ग्रहण, जानिए सयम और तारीख

नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। Surya Grahan 2023 : साल 2023 का पहला सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल को लगने जा रहा है। इस साल वैशाख अमावस्या पर एक ही दिन में तीन तरह के सूर्य ग्रहण दिखेंगे, जिसे वैज्ञानिकों ने हाइब्रिड सूर्य ग्रहण कहा है। माना जाता है कि वैशाख अमावस्या के दिन पितरों के तर्पण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वैशाख मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वैशाखी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है।

इस बार संयोग से 100 साल बाद हाइब्रिड सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। इस बार सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल, गुरुवार को लगने जा रहा है। मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितरों के नाम दान करना बड़ा ही फलदायी होता है। लेकिन इस बार यह सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। इसलिए सूर्य ग्रहण का अमावस्या पर कोई असर नहीं होगा।

कब लगता है सूर्यग्रहण

आम तौर पर, सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है, जिससे पृथ्वी की सतह पर एक छाया पड़ती है। 

सूर्यग्रहण 2023 डेट व टाइम 

इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल 2023 को लगने जा रहा है। लोग इस दिन आंशिक सूर्य ग्रहण देखेंगे। अगला सूर्य ग्रहण 14 अक्टूबर, शनिवार को लगेगा। भारतीय समय के अनुसार, सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल 2023 को लगेगा और सुबह 7:04 बजे शुरू होगा और दोपहर 12:29 बजे समाप्त होगा। दुर्लभ सूर्य ग्रहण ऑस्ट्रेलिया, पूर्व और दक्षिण एशिया, प्रशांत महासागर, अंटार्कटिका और हिंद महासागर से दिखाई देगा।

इन देशों में दिखेगा सूर्यग्रहण

यह सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। यह सूर्य ग्रहण चीन, अमेरिका, माइक्रोनेशिया, मलेशिया, फिजी, जापान, समोआ, सोलोमन, सिंगापुर, थाइलैंड, कंबोडिया, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम, ताइवान, पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर जैसी जगहों पर दिखाई देगा। 

सूर्यग्रहण को कैसे देख सकते हैं?

  • टेलीस्कोप का उपयोग करके व्हाइटबोर्ड पर सूर्य की छवि को प्रक्षेपित करके देखें।
  • सूर्य ग्रहण देखने के लिए ब्लैक पॉलीमर, एल्युमिनाइज्ड माइलर या शेड नंबर 14 के वेल्डिंग ग्लास जैसे आई फिल्टर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, सीधे ग्रहण देखना सुरक्षित नहीं है।
  • सूर्य ग्रहण को ग्रहण के चश्मे से देखें।
  • सूर्य ग्रहण देखने के लिए घर में बने फिल्टर या साधारण चश्मे का इस्तेमाल न करें।

क्या होता है सूतक काल

सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक काल लग जाता है। इस दौरान किसी भी तरह का कोई शुभ काम या पूजा-पाठ करना मना होता है। सूतक काल के दौरान मंत्रों का जाप करते रहना चाहिए। ग्रहण की समाप्ति के बाद सूतक काल खत्म हो जाता है। ग्रहण के बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करना चाहिए और स्नान करना चाहिए। 

आंशिक, पूर्ण और कुंडलाकार ग्रहण

आंशिक सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा, सूर्य के किसी छोटे हिस्से के सामने आकर रोशनी रोकता है, तब आंशिक सूर्य ग्रहण होता है। कुंडलाकार सूर्य ग्रहण में चंद्रमा सूर्य के बीच आकर रोशनी रोकता है, तब चारों तरफ एक चमकदार रोशनी का गोला बनता है, इसे रिंग ऑफ फायर कहते हैं। वहीं पूर्ण सूर्य ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं। इसके कारण पृथ्वी के एक भाग पर पूरी तरह से अंधेरा छा जाता है। तब पूर्ण सूर्य ग्रहण की स्थिति बनती है। इसे खुली आंखों से बिना किसी यंत्र के भी देखा जा सकता हैं।

क्या है हाइब्रिड सूर्य ग्रहण

हाइब्रिड सूर्य ग्रहण आंशिक, पूर्ण और कुंडलाकार सूर्य ग्रहण का मिश्रण होता है। यह सूर्य ग्रहण लगभग 100 साल में एक ही बार देखने को मिलता है। इस सूर्य ग्रहण के समय चंद्रमा की धरती से दूरी न तो ज्यादा होती है और न ही कम। इस दुर्लभ ग्रहण के दौरान सूर्य कुछ सैकेंड के लिए एक वलय यानी रिंग जैसी आकृति बनाता है, जिसे अग्नि का वलय यानी रिंग ऑफ फायर कहा जाता है।

सूर्य ग्रहण का पौराणिक कारण

या चंद्र ग्रहण लगने का कारण समुद्र मंथन से जुड़ा है। इसके अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत का सेवन करने के लिए देवताओं और दानवों के बीच विवाद हो गया था। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर पहले देवताओं को अमृत पान कराया, लेकिन देवताओं की पंक्ति में एक असुर ने भी बैठकर अमृत पान कर लिया लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और विष्णु जी को इसके बारे में बता दिया।

तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस दानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत पान कर लेने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई। इसी दानव के सिर वाला भाग राहू और धड़ वाला भाग केतू कहलाया। इस घटना के बाद सूर्य और चंद्रमा राहू केतु के शत्रु हो गए और राहू-केतु सूर्य और चंद्रमा को क्रॉस करते हैं, जिसे ग्रहण कहा जाता है।


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