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'अस्पष्ट जमानत आदेशों पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की उत्तराखंड सरकार की अपील

Published: Fri, 31 Jul 2026 08:57 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पष्ट जमानत आदेशों पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि किसी व्यक्ति की आजादी अभियोजन पक्ष के मामले पर निर्भर करती है।

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HighLights

  1. अस्पष्ट जमानत आदेशों पर दोबारा विचार की जरूरत नहीं।

  2. उत्तराखंड सरकार की बनभूलपुरा हिंसा मामले में अपील खारिज।

  3. सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए लागू करने पर सवाल उठाए।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अस्पष्ट जमानत आदेशों पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि किसी व्यक्ति की आजादी कोर्ट की किसी गलती पर नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के मामले पर निर्भर करती है।

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उत्तराखंड सरकार की उस अपील को खारिज करते हुए की, जिसमें फरवरी, 2024 के बनभूलपुरा हिंसा मामले के आरोपित अब्दुल मलिक को जमानत देने के नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

आठ फरवरी, 2024 को एक मस्जिद के ध्वस्तीकरण के दौरान भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और सरकारी व निजी वाहनों में आग लगा दी थी। उन्होंने एक पुलिस स्टेशन में भी आग लगा दी थी और पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके थे।

आरोप था कि इसकी साजिश मलिक के घर पर रची गई थी। उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने जमानत रद करने की मांग करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने बिना कारण बताए अस्पष्ट जमानत आदेश पारित किया।

शीर्ष अदालत के जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा, "अस्पष्ट जमानत आदेशों पर भी दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है।" भाटिया ने कहा कि बिना कारण वाले जमानत आदेश शीर्ष अदालत के कई फैसलों के विरुद्ध हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि उन फैसलों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है और राज्य पुलिस द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) लागू करने पर सवाल उठाए।

इससे पहले, जस्टिस बागची ने एक मामले में चैतन्य बघेल को जमानत देने वाले हाई कोर्ट के आदेश के विरुद्ध ईडी और छत्तीसगढ़ सरकार की याचिकाओं को खारिज करते हुए जमानत आदेशों को बार-बार चुनौती देने के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। तब जस्टिस बागची ने कहा था, "एक फैसले में कहा गया था कि जब जमानत दी जाती है, तो कारण बताने की जरूरत नहीं होती। लेकिन जब जमानत नहीं दी जाती, तो कारण बताए जाते हैं।"

मौजूदा मामले का जिक्र करते हुए जस्टिस बागची ने पूछा, "अगर कोई भीड़ पुलिस स्टेशन जला देती है, तो उस पर यूएपीए कैसे लागू होता है?" भाटिया ने जवाब दिया कि इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है और ऐसे आरोपित को जमानत देने से पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरेगा।

जस्टिस बागची ने कहा, "अगर आपको लगता है कि पुलिस का मनोबल गिरना चिंता की बात है, तो आपको दो वर्ष के भीतर उसे दोषी ठहरा देना चाहिए था। आप अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी निभाने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं... आपको अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी की नाकामी छिपाने के लिए जमानत रद होने के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने का बहाना नहीं बनाना चाहिए।" उन्होंने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था एवं यूएपीए अलग-अलग हैं और कड़े प्रविधानों को लागू करने पर बहस की जा सकती है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)