नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नदियों में प्रदूषण और उससे लोगों की सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए कहा है कि साफ पर्यावरण व प्रदूषण रहित जल यानी शुद्ध जल व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना कल्याणकारी राज्य का संवैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने नदियों में प्रदूषण के मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देता है और इस अधिकार में गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार शामिल है। 

नदियों में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान

कोर्ट ने कहा कि संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार के तहत साफ पयार्वरण और प्रदूषण रहित जल यानी शुद्ध जल का अधिकार शामिल है। इतना ही नहीं, कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 47 और 48 में पब्लिक हेल्थ ठीक करना और पर्यावरण संरक्षित करना राज्यों का दायित्व है। साथ ही प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्रकृति जैसे वन, नदी, झील और जंगली जानवरों का संरक्षण और रक्षा करे। कोर्ट ने कहा कि इससे साफ है कि संवैधानिक व्यवस्था में शुद्ध जल पाना व्यक्ति का मूल अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना कल्याणकारी राज्य का दायित्व है। 

कोर्ट सबसे पहले यमुना नदी के प्रदूषण पर करेगा सुनवाई

कोर्ट ने नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के मामले में सुनवाई शुरू की है और इसकी शुरुआत यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने से की गई है। कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए पांच राज्यों, केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को नोटिस जारी किया है। साथ ही सीपीसीबी से यमुना प्रदूषण पर रिपोर्ट भी मांगी है।यह आदेश प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, एएस बोपन्ना और वी. रामासुब्रमणियम की पीठ ने दिल्ली जल बोर्ड की हरियाणा से आ रहे पानी में प्रदूषण की शिकायत करने वाली अर्जी पर सुनवाई के दौरान जारी किए। कोर्ट ने दिल्ली सरकार की अर्जी पर भी हरियाणा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। 

केंद्र, सीपीसीबी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश को जारी किया नोटिस

इसके अलावा कोर्ट ने नदियों में प्रदूषण के मुख्य मामले को नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के नाम से अलग केस के रूप में सुनवाई के लिए पंजीकृत करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने मुख्य मामले में सबसे पहले यमुना नदी के प्रदूषण पर सुनवाई शुरू की है। कोर्ट ने इस मामले मे पांच राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी किया है। साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण सचिव, वन एवं जलवायु परिवर्तन सचिव, शहरी विकास मंत्रालय तथा सीपीसीबी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सीपीसीबी को निर्देश दिया कि वह रिपोर्ट दाखिल कर बताए कि यमुना किनारे के किन नगर निकायों ने जरूरत के हिसाब से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाए हैं या फिर वे यह सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं कि प्रदूषित सीवर नदी में न जाए। 

सीपीसीबी से यमुना में प्रदूषण पर रिपोर्ट भी मांगी

कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा सीपीसीबी रिपोर्ट में नदियों में प्रदूषण के अन्य स्त्रोत भी बताएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में मदद करने के लिए वरिष्ठ वकील मिनाक्षी अरोड़ा को न्यायमित्र नियुक्त किया है। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि इस मामले में दिए गए आदेश किसी भी तरह से पहले कोर्ट द्वारा जारी किए गए किसी निर्देश या किसी ट्रिब्युनल के आदेश को कम नहीं करते।

कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड की अर्जी को भी इसी मामले के साथ सुनवाई के लिए संलग्न करने का आदेश दिया और मामले को 19 जनवरी को फिर सुनवाई पर लगाने का निर्देश दिया है। दिल्ली जल बोर्ड ने अपनी अर्जी में शिकायत की है कि हरियाणा से आने वाले पानी में अमोनिया की मात्रा बहुत अधिक है और वह पानी पीने योग्य नहीं है। दिल्ली जल बोर्ड ने पानी प्रदूषित होने की शिकायत की है। यह भी कहा कि अगर पानी साफ करने के लिए ज्यादा क्लोरीन मिलाई जाएगी तो उससे कैंसर होने की आशंका रहती है। 

जल बोर्ड का कहना है कि हरियाणा के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट काम नहीं कर रहे हैं।कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि मौजूदा अर्जी यमुना में अधिक अमोनिया बढ़ने की शिकायत से जुड़ी है। यह एक गंभीर मुद्दा है। यह न सिर्फ इंसानों की सेहत बल्कि जल पर निर्भर रहने वाले हर जीव के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। नदियां और जल स्त्रोत जीवन का आधार हैं। अत्यधिक बढ़ती जनसंख्या, आधुनिक रहन-सहन और बड़े पैमाने पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों व उद्योगों ने साफ जल की मांग बढ़ाई है। इसके साथ ही जल में प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। पानी का सीधा संबंध व्यक्ति की सेहत से है। ये स्थापित बात है कि प्रदूषित जल की आपूर्ति लोगों में बीमारियों का मुख्य कारण है। शुद्ध जल और साफ पयार्वरण व्यक्ति के जीवन के अधिकार के तहत आता है।

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