माला दीक्षित, नई दिल्ली। मौजूदा और पूर्व सांसदों के खिलाफ देशभर की अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमों को जल्द निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमर कस ली है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वे उनके यहां लंबित ऐसे आपराधिक मामलों को तत्काल सुनवाई के लिए उचित पीठ के समक्ष लगाएं। विशेषकर जिन मामलों में कोर्ट ने रोक आदेश जारी कर रखा है, उनमें पहले यह देखा जाए कि रोक जारी रहना जरूरी है कि नहीं। अगर रोक जारी रहना जरूरी है, तो उस मामले को रोजाना सुनवाई करके दो महीने में निपटाया जाए। इसमें कोई ढिलाई न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि इस काम में कोरोना महामारी बाधा नहीं हो सकती, क्योंकि ये सारे मामले वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुने जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से मामले के निपटारे के लिए जरूरी विशेष अदालतों की संख्या तथा ढांचागत संसाधनों के बारे में एक कार्य योजना तैयार करके भेजने का निर्देश दिया है। न्यायमित्र वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया द्वारा दिए गए सुझावों पर भी विचार मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे इस पर भी विचार करें कि जिन मुकदमों की सुनवाई तेजी से चल रही है, उन्हें दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की जरूरत है कि नहीं या ऐसा करना उचित होगा कि नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वे एक पीठ गठित करें, जो सांसदों-विधायकों के लंबित मुकदमों के निपटारे की प्रगति की निगरानी करे। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश स्वयं और उनके द्वारा नामित न्यायाधीश शामिल होंगे।

ये आदेश न्यायमूर्ति एनवी रमना की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान गत बुधवार को दिए। इस मामले में कोर्ट राजनीति का अपराधीकरण रोकने और सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों के जल्द निपटारे पर विचार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण को रोकने से जुड़े इस केस को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि उसने मामले में 14 सितंबर, 2016 को नोटिस जारी किया था और उसके बाद कई आदेश दिए। 

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