नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। विवाहेतर संबंध बनाने पर महिला को अपराधी मानने से छूट देने वाला कानून सुप्रीम कोर्ट के स्कैनर पर है। कोर्ट विचार करेगा कि शादीशुदा महिला के परपुरुष से संबंध बनाने में सिर्फ पुरुष ही दोषी क्यों, महिला क्यों नहीं।

सुप्रीम कोर्ट विवाहिता को संरक्षण देने वाली आइपीसी की धारा 497 (व्याभिचार (एडल्टरी) और सीआरपीसी की धारा 198(2) की वैधानिकता परखेगा। कोर्ट ने केन्द्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने मामले पर विचार का मन बनाते हुए कहा कि पहली निगाह में लगता है कि ये कानून बहुत पुराना पड़ चुका है। समाज प्रगति कर रहा है। लोगों को अधिकार मिल रहे हैं। नयी पीढ़ी में नये विचार आ रहे है ऐसे में इस पर विचार किये जाने की जरूरत है।

नोटिस जारी करते हुए ये टिप्पणियां मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर व न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने केरल के रहने वाले जोसेफ शाइनी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

जोसेफ ने याचिका में आइपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198(2) को पुरुषों के साथ भेदभाव वाला बताते हुए चुनौती दी है। याचिका में कोर्ट से ये दोनों प्रावधान असंवैधानिक घोषित कर रद किये जाने की मांग की गई है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ही तीन पूर्व फैसलों का हवाला दिया गया है जिसमें इस कानून पर विचार और टिप्पणियां तो हुईं लेकिन उसे वैध ठहराया गया और वह आइपीसी का हिस्सा बना रहा। याचिकाकर्ता के वकील कलीश्वरन ने कोर्ट से कहा कि विधि आयोग अपनी रिपोर्ट में और मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट में भी इस कानूनी प्रावधान को खत्म किये जाने की सिफारिश हो चुकी है लेकिन फिर भी पुरुष और महिला में भेद करने वाला यह कानून बना हुआ है।

दलीलें सुनने के बाद पीठ ने याचिका पर विचार का मन बनाते हुए अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया धारा 497 देखने से लगता है कि इसमें पत्नी को राहत दी गई है उसे पीडि़ता माना गया है। लेकिन यह दर्ज करना भी जरूरी है कि दो लोग मिल कर अपराध को अंजाम देते हैं, एक व्यक्ति अपराध का भागी होता है और दूसरा पूरी तरह दोष मुक्त। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि यह कानून सामाजिक अवधारणा पर आधारित है। सामान्य तौर पर आपराधिक कानून में लैंगिक भेदभाव नहीं होता लेकिन इस प्रावधान में यह अवधारणा नदारद है।

पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि क्या किसी महिला को सकारात्मक अधिकार प्रदान करते समय इस हद तक जाया जा सकता है कि उसे पीडि़ता मान लिया जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कानून की भाषा से देखा जाये तो अगर उसमें पति की सहमति साबित कर दी जाए तो अपराध खत्म हो जाता है। इस तरह तो यह प्रावधान वास्तव में महिला की व्यक्तिगत पहचान पर कुठाराघात करता है। पति की सहमति का मतलब है कि महिला पति के आधीन है जबकि संविधान उसे बराबरी का दर्जा देता है। कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज यह अहसास करे कि महिला हर क्षेत्र में पुरुष के बराबर है।

क्या है आइपीसी की धारा 497 (एडल्टरी)

कोई भी व्यक्ति जानबूझकर दूसरे की पत्नी से उसके पति की सहमति के बगैर शारीरिक संबंध बनाता है और वह यौन संबंध दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता, तो वह व्यक्ति एडल्टरी का अपराध करता है। उस व्यक्ति को पांच वर्ष तक की कैद या जुर्माने अथवा दोनों की सजा हो सकता है।

क्या कहती है सीआरपीसी की धारा 198(2)

इस अपराध में सिर्फ विवाहिता का पति ही शिकायत कर सकता है। पति की अनुपस्थिति जो व्यक्ति महिला के पति की ओर से उस महिला की देखभाल कर रहा है, वह कोर्ट की इजाजत से पति की ओर से शिकायत दर्ज करा सकता है। 

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By Manish Negi