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देश में आत्महत्या के बढ़ते मामलों से सुप्रीम कोर्ट काफी चिंतित, जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बच्चों द्वारा की जा रही आत्महत्या एक बहुत ही गंभीर सामाजिक मुद्दा है। इसको रोकने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वह भारत में आत्महत्या की रोकथाम के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में कोर्ट को अवगत कराए।

By Jagran News Edited By: Siddharth Chaurasiya Thu, 11 Jul 2024 07:29 PM (IST)
देश में आत्महत्या के बढ़ते मामलों से सुप्रीम कोर्ट काफी चिंतित, जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब
देश में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने गुरुवार को चिंता जताई है।

पीटीआई, नई दिल्ली। देश में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने गुरुवार को चिंता जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत में आत्महत्या की रोकथाम के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लेकर हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया।

आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को 'सामाजिक मुद्दा' बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र को आत्महत्याओं की रोकथाम और कमी के लिए एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के प्रभावी कार्यान्वयन की मांग करने वाली जनहित याचिका पर एक व्यापक जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया निर्देश

मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने वकील और याचिकाकर्ता गौरव कुमार बंसल की दलीलों पर ध्यान दिया कि आत्महत्या के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है और केंद्र से एक व्यापक हलफनामा दाखिल करने को कहा।

सीजेआई ने कहा, "यह एक सामाजिक मुद्दा है, केंद्र और अधिकारियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने दें।" शीर्ष अदालत ने 2 अगस्त, 2019 को जनहित याचिका पर केंद्र और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किए थे।

याचिका में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आत्महत्या के विचार रखने वाले व्यक्तियों को कॉल सेंटर और हेल्पलाइन के माध्यम से सहायता और सलाह प्रदान करने के लिए एक परियोजना शुरू करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। दिल्ली पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि 2014 से 2018 के बीच 18 साल से कम उम्र के बच्चों की आत्महत्या के 140 मामले दर्ज किए गए।

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जनहित याचिका में क्या कहा गया?

याचिका में कहा गया है कि भारत में आत्महत्याओं की रोकथाम और कमी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का मसौदा तैयार करने, डिजाइन करने और उसे लागू करने में अधिकारियों की विफलता न केवल मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 29 और 115 का उल्लंघन है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) का भी उल्लंघन है।

बंसल ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि दिल्ली सरकार यहां 'स्वस्थ सामाजिक माहौल प्रदान करने में विफल रही है।' याचिका में कहा गया है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के विभिन्न प्रावधानों को लागू करने में विफल रहे हैं और उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र में आत्महत्याओं की रोकथाम और कमी के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

इसमें कहा गया है कि अधिकारियों को आत्महत्याओं की रोकथाम और कमी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को लागू करने के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों पर स्थिति रिपोर्ट प्रदान करने के लिए कहा जाना चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट 'निवारक आत्महत्या - एक वैश्विक अनिवार्यता' का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा है कि युवा लोग इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं और आत्महत्या अब वैश्विक स्तर पर 15 से 29 वर्ष की आयु के लोगों के लिए मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है।