बाल श्रम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र को विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्देश, 2016 के कानून को पूरी तरह लागू करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के कार्यान्वयन की निगरानी ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट का बाल श्रम संशोधन अधिनियम लागू करने को विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्देश।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्देश दिया।
बाल श्रम संशोधन अधिनियम 2016 के कार्यान्वयन की निगरानी होगी।
खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित होगा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को विशेष प्रकोष्ठ गठित करने और बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के प्रविधानों के कार्यान्वयन की निगरानी करने का निर्देश दिया है। यह अधिनियम खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिकों को काम पर रखने पर रोक लगाता है।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को इस संबंध में राज्यों के संबंधित मुख्य सचिवों के माध्यम से प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश जारी करने को कहा।
पीठ ने कहा,"बच्चों और किशोरों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से हम दूसरे प्रतिवादी को विशेष प्रकोष्ठ गठित करने, अधिनियम के प्रविधानों के कार्यान्वयन की निगरानी जारी रखने और अधिनियम संख्या 35, 2016 के तहत किए संशोधन के अनुसार राज्यों के संबंधित मुख्य सचिवों के जरिये प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश जारी करने का आदेश देते हैं।"
याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन हेल्थ फोर मिलियन्स की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेव पेश हुए। बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 (संख्या 35, 2016) ने मूल बाल श्रम अधिनियम, 1986 में संशोधन किया था। यह एक सितंबर, 2016 से लागू हुआ। इसने बाल श्रमिकों को काम पर रखने पर पूरी तरह रोक लगा दी और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सभी व्यवसायों और प्रक्रियाओं में काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाया।
याचिका में केंद्र को ऐसे बाल श्रमिकों के लिए शिक्षा सुविधाएं और दिन में दो बार भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी। सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश वकील ने पीठ को बताया कि मूल अधिनियम में संशोधन के बाद याचिकाकर्ता की शिकायत का काफी हद तक समाधान हो चुका है और याचिका पर विचार करने की जरूरत नहीं रह गई है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि रिट याचिका में की गई मांग पर आगे विचार करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, संशोधन अधिनियम संख्या 35, 2016 के जरिए किए गए बदलावों को पूरी तरह प्रभावी करना बाकी है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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