सुप्रीम कोर्ट ने 1987 के फैसले पर जताई नाराजगी, कहा - हर मामले में देरी माफ करना देश के लिए ठीक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1987 के एक फैसले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि केवल चार दिन की देरी ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने 1987 के फैसले पर जताई नाराजगी
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने 1987 के फैसले पर जताई नाराजगी।
चार दिन की देरी माफ करने से देश पीछे धकेला।
न्याय में देरी माफ करने का नियम हर मामले पर नहीं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 1987 के अपने एक फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि केवल चार दिन की देरी माफ करने वाले उस निर्णय ने देश को पीछे धकेल दिया है। एक बार माफ करने के बाद अब इसे हर मामले में राहत पाने का आधार बना लिया गया है। जिससे देश पीछे चला गया है।
दरअसल, कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड और उसके पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक सी. पार्थसारथी की अपीलें खारिज करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय को तकनीकी आधार पर न रोकने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर मामले में देरी माफ कर दी जाए।
कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड और सी. पार्थसारथी दोनों ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपील दायर करने में हुई देरी माफ करने से इनकार कर दिया गया था।
सबके लिए नियम एक समान
कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि अपील की समयसीमा का पालन कराने में सरकारी संस्थाओं और निजी पक्षों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। सरकारी और निजी सबके लिए समयसीमा का नियम एक समान है। हर मामले में देरी के कारणों और परिस्थितियों का आकलन करना जरूरी है।
क्या था 1987 का मामला?
ज्ञात हो कि 1987 का कातिजी केस जम्मू-कश्मीर में सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित जमीन के मुआवजे से जुड़ा हुआ था। जिसमें जमीन का मुआवजा बढ़ाकर करीब 14 लाख रुपए किए जाने के फैसले को राज्य सरकार ने चुनौती दी गई थी।
इस दौरान अपील दाखिल करने के दौरान चार दिन देरी होने पर हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि अपील में देरी होने पर केवल तकनीकी आधार पर न्याय से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने देरी को माफ कर मामले को पुन: हाई कोर्ट भेज दिया था।
