विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'नागरिकों के प्रदर्शन का अधिकार पुलिस एक्ट के दायरे से बाहर नहीं', प्रोटेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

Published: Mon, 12 Oct 2026 07:00 AM (IST)Updated: Mon, 12 Oct 2026 07:04 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सीजेपी प्रदर्शनों के बीच नागरिकों के प्रदर्शन के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की, कहा कि ...और पढ़ें

विरोध प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी। (फाइल फोटो।)

विरोध प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. प्रदर्शन का अधिकार पुलिस एक्ट के दायरे में हो।

  2. मेट्रो, इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के निर्देश।

  3. अवमानना पर गृह सचिव, पुलिस आयुक्त को नोटिस।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के कारण दिल्ली में व्यापक प्रतिबंधों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को मौखिक टिप्पणी की कि नागरिकों के प्रदर्शन करने के अधिकार पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन प्रदर्शन का तरीका पुलिस एक्ट के दायरे से बाहर नहीं हो सकता, यह उसके अनुरूप होना चाहिए। मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून में तय प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि शांतिपूर्वक एकत्रित लोगों को गैरकानूनी रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। केंद्र सुनिश्चित करे कि दिल्ली मेट्रो सामान्य समय-सारिणी के अनुसार चले और इंटरनेट सेवाएं बाधित न हों।

सुप्रीम कोर्ट ने की विशेष सुनवाई

जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने विशेष सुनवाई के दौरान उस याचिका पर विचार किया जिसमें सीजेपी के प्रदर्शन के कारण दिल्ली में मेट्रो व ट्रेन सेवाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगाने संबंधी शीर्ष अदालत के निर्देश के कथित उल्लंघन पर अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में अवमानना का मामला बनता है।

कोर्ट ने किनको जारी किए नोटिस?

सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन (डीएमआरसी) चेयरपर्सन को नोटिस जारी किए। पीठ ने कहा, उन्हें 13 अक्टूबर, 2026 तक उक्त याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जाता है। इसमें हमारे पूर्व के आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी शामिल हो। फिलहाल उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने और क्या कहा?

पीठ ने सालिसिटर जनरल तुषार मेहता से सुनिश्चित करने को कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य लोगों को अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करने में बाधा न आए। साथ ही कहा, जब हम कह रहे हैं कि इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रहेंगी, तो हमारा आशय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिली शक्तियों को समाप्त करना नहीं है। कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा कोई गैरकानूनी हिरासत नहीं होगी। खास तौर पर उन लोगों के मामले में, जो उस क्षेत्र से बाहर एकत्र हों जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-163 लागू की गई है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि स्थानीय प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाकर गुरुग्राम जैसे दूर-दराज के इलाकों या निर्धारित परिचालन क्षेत्र से बाहर कहीं और हिरासत में लेने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने कहा, हमें बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आसपास बीएनएसएस की धारा-163 लागू होने की जानकारी देने वाला बोर्ड लगाया गया है। यदि यह बोर्ड अब तक नहीं हटाया गया है, तो इसे हटा दिया जाए, ताकि नागरिकों व वकीलों को न्याय तक पहुंच मिल सके।

कपिल सिब्बल ने क्या बताया?

सुनवाई के राजद सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि पुलिस ट्रेनों से लोगों को हिरासत में ले रही है और जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे से बाहर मौजूद लोगों को भी पकड़ रही है। अदालत के नौ अक्टूबर के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश व निकास पर रोक लगा दी गई थी।

सुनवाई के दौरान किसने क्या कहा?

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि शहर में करीब 45 हिरासत केंद्र बनाए गए हैं और विपक्षी नेताओं समेत करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है।

शनिवार को प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि उनके साथ-साथ बड़ी संख्या में अन्य वकीलों के साथ भी बर्बरता की गई। शहर में स्थिति बेहद दमनकारी थी। कृपया राजधानी में शांतिपूर्वक प्रदर्शन के अधिकार को बहाल करें।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि लोगों की आवाजाही बहाल हो, सभी बैरिकेड हटाए जाएं और मेट्रो स्टेशनों पर सेवाएं बहाल की जाएं।

एसजी तुषार मेहता ने कहा कि 10 अक्टूबर को 303 में से केवल 45 स्टेशनों पर प्रवेश व निकास पर रोक लगाई गई थी, जो पूरे मेट्रो नेटवर्क का केवल 15 प्रतिशत है। हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की मांग वाली याचिकाएं अब विचारणीय नहीं रह गई हैं, क्योंकि उनमें से अधिकतर को पहले ही छोड़ दिया गया है।

उन्होंने कहा कि इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी गई है और सभी मेट्रो स्टेशन चालू हैं।अदालत गुरुस्वामी की ओर से राजनीतिक नेताओं की हिरासत के विरुद्ध दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी सुनवाई कर रही थी। झा की याचिका भी अदालत के समक्ष लंबित है।

अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई है। गौरतलब है कि शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस मोहना की पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया था कि प्रदर्शन के कारण 10 अक्टूबर को मेट्रो के संचालन और दिल्ली आने वाली ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक न लगे।

अदालत का कहना था कि हर चीज ठप नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा था कि कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को आवाजाही सीमित करने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

यह भी पढ़ें: 'दिल्ली से तुरंत हटाएं सभी बैरिकेड्स', CJP प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट का पुलिस को आदेश