नई दिल्ली, प्रेट्र। राजनीति और धार्मिक रूप से अतिसंवेदनशील अयोध्या मामले पर फैसला सुनाने में सुप्रीम कोर्ट ने संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फारसी, तुर्क, फ्रेंच और अंग्रेजी भाषा के इतिहास, संस्कृति, धार्मिक और पुरातत्व से जुड़ी किताबों और उनके अनुवादित संस्करणों का भी हवाला दिया। लेकिन, इन किताबों पर भरोसा करने में शीर्ष अदालत ने बहुत ज्यादा सावधानी बरती, क्योंकि किसी विषय के आलोक में इतिहास का विश्लेषण करना हमेशा खतरनाक होता है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 533 दस्तावेजों को साक्ष्यों में शामिल किया। इनमें धार्मिक पुस्तकें, यात्रा वृत्तांत, पुरातात्विक खोदाई की रिपोर्ट, मस्जिद गिरने से पहले ही विवादित स्थल की तस्वीरें और कलाकृतियां शामिल हैं। दस्तावेजी साक्ष्यों में गजट और खंभों पर अंकित लेखों का अनुवाद भी शामिल था। लेकिन, शीर्ष अदालत ने ऐतिहासिक संदर्भो के इस्तेमाल में बहुत सावधानी बरती है। पीठ का कहना है कि इतिहास का विश्लेषण 'ऐसा कार्य है, जिसमें गिरने की आशंका बहुत ज्यादा है।'

फैसले में पीठ ने कहा है कि ऐतिहासिक रिकॉर्डो में खामियां दिखती हैं, जैसा कि हम बाबरनामा में देखते हैं। अनुवाद अलग-अलग होते हैं और उनकी अपनी सीमाएं हैं। अदालत को ऐसे नकारात्मक विश्लेषण से बचना चाहिए जो ऐतिहासिक साक्ष्यों में मौजूद ही नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि बिना हिस्टोरियोग्राफी की मदद के इतिहास का विश्लेषण करना खतरनाक है।

आस्था पर व‌र्ड्सवर्थ की कविता का जिक्र

(आइएएनएस)अयोध्या विवाद पर अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने आस्था पर अंग्रेजी के महान कवि विलियम व‌र्ड्सवर्थ की कविता का एक अंश भी उद्धृत किया है। जज की पहचान हालांकि उजागर नहीं की गई है। फैसले में लिखा गया है कि हर धर्म, हर आस्था ईश्वर की महिमा का गुणगान करती है, जिनसे हम सब जुड़ना चाहते हैं।

Posted By: Nitin Arora

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