पटना (सदगुरु शरण)। यह आइआइटियन अनूप राज की कहानी है। लाखों गुदड़ी के लालों को समर्पित, जो कामयाबी का आसमां छूने की ख्वाहिश और कूबत तो रखते हैं, पर गांवों में प्रारंभिक शिक्षा की बदहाली, साधनहीनता, मार्गदर्शन के अभाव और अंग्रेजी के आतंक के कारण सपने साकार करने का हौसला छोड़ देते हैं। घोर नक्सल प्रभावित एवं स्कूलविहीन गांव में जन्मे एक ऐसे बच्चे की मोहित कर देने वाली प्रेरक कहानी, जिसने 10 साल की उम्र तक स्कूल का मुंह नहीं देखा, पर अगले आठ सालों में जिसने शिक्षा के लिए जुनून से अपना प्रारब्ध बदलकर रख दिया। आइआइटी मुंबई से 2014 में सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री पाने के बाद अनूप राज ने सिर्फ छह महीने एक बड़ी कंपनी में नौकरी की। अब नौकरी छोड़कर मुंबई में ही अपने तीन इंजीनियर दोस्तों के साथ मेडिकल केयर स्टार्ट-अप पीएस टेककेयर चला रहे हैं।


ऐसे शुरू हुआ संघर्ष
औरंगाबाद (बिहार) जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर गांव चेंव। इसी गांव में कच्ची मिट्टी की दीवारों पर खपरैल की छत वाले झोपड़ीनुमा मकान में रामप्रवेश प्रसाद का 22 सदस्यीय संयुक्त परिवार रहता था। हर तरह के दुख-दरिद्रता की इंतिहा। खुद ग्रेजुएट रामप्रवेश अनूप को घर पर ही गणित और व्याकरण पढ़ाते थे क्योंकि गांव का स्कूल नक्सलियों ने बहुत पहले बंद करवा दिया था। 10 साल की उम्र में नजदीकी कस्बे के एक मिशनरी स्कूल में सीधे कक्षा पांच में दाखिले के साथ अनूप की शिक्षा का संघर्ष से भरा कठिन सफर शुरू हुआ।

तदवीर से बदली तकदीर की तस्वीर
इस जुनूनी युवा की विस्मित कर देने वाली सक्सेस स्टोरी के दो सिरे महसूस करने के लिए इन दोनों तस्वीरों पर गौर करिए। पहली, गांव के अपने पुश्तैनी मकान में मां के साथ खड़े अनूप। दूसरी, केबीसी के मौजूदा एडीशन में पटना की सुपर-30 कोचिंग के संस्थापक आनंद कुमार के साथ बैठे अनूप। वास्तव में यह सिर्फ अनूप राज की कामयाबी की कहानी नहीं है। यह जिंदगी के कठोरतम इम्तिहानों से गुजरकर एक मां का अपने बेटे के लिए बुना सपना साकार होने की कहानी है, जिसे उसने अपने असाधारण संघर्ष से बिखरने नहीं दिया। यह गणितज्ञ आनंद कुमार की तमाम गौरव-गाथाओं की प्रतिनिधि कहानी भी है, जिस पर वह बेहद गर्व करते हैं और सुपर-30 के हर नए छात्र को जरूर सुनाते हैं।

ये था निर्णायक मोड़
शिक्षा की इसी किरण का सिरा थामकर मां-बेटा आनंद कुमार की सुपर-30 कोचिंग पहुंचे। उन्हें कहीं से जानकारी प्राप्त हुई थी कि पटना में ये संस्था अनूप जैसे होनहारों के लिए ही बनी है। जहां पढ़ अनूप जैसे 30 बच्चे हर साल आइआइटी तक पहुंचते हैं। अनूप ने प्रवेश परीक्षा दी और 2009 में उसे यहां वह मसीहा मिला, जिसने उसे उसकी मंजिल दिखाई। जी हां, गणितज्ञ आनंद कुमार। यह अनूप की जिंदगी का टर्निंग पाइंट साबित हुआ। यहां कोचिंग पाकर 2010 में उसे आइआइटी मुंबई में सिविल इजीनियरिंग में दाखिला मिल गया। अब उसे सब कुछ हासिल है। गांव में पक्का घर। मुंबई में मजबूत कंपनी।

ऐसे किया सामना
अनूप खुद पढ़ाई करते हुए ट्यूशन भी पढ़ाता था। इससे 250 रुपए महीने अर्जित करता था ताकि परिवार और पढ़ाई का खर्च चले। 2006 में एकमात्र सहारा पिताजी बिना कुछ कहे- बताए घर से चले गए तो आज तक नहीं लौटे। घोर संकट की घड़ी में संयुक्त परिवार ने भी किनारा कर लिया। इन हालात में भी अनूप ने धैर्य नहीं खोया। पढ़ते और पढ़ाते हुए मैट्रिक परीक्षा 85 फीसद और इंटरमीडिएट परीक्षा 82 फीसद अंकों के साथ उत्तीर्ण की।

मुझे बेहद संतुष्टि है कि समाज के अंतिम आर्थिक पायदान से आगे बढ़ा एक बच्चा अपनी मेधा और शिक्षा के बल पर आज तमाम युवाओं को न सिर्फ रोजगार दे रहा है बल्कि अपने जैसे बच्चों को राह भी दिखा रहा है।
- आनंद कुमार,

सुपर-30 के संस्थापक बचपन से ही आर्थिक तंगी को बहुत करीब से देखा। एक समय ना खाकर किताब खरीद लेना आदत बन गई थी। अब कुछ ऐसा करने की ख्वाहिश है जिससे ऐसे हालात किसी अन्य छात्र-छात्रा की पढ़ाई में बाधा न बनें। युवाओं के लिए अधिक से अधिक रोजगार पैदा करने के उद्देश्य से ही मैंने अपनी कंपनी शुरू करने का प्रयास किया है।- अनूप राज

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Posted By: Srishti Verma