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करुणानिधि से लेकर विजय तक.... दक्षिण भारत की राजनीति में जहां परदे के महानायक बनते हैं 'जननायकन'

Published: Sun, 10 May 2026 11:07 PM (IST)

दक्षिण भारत में सिनेमा और राजनीति का गहरा संबंध दशकों से चला आ रहा है, जहां फिल्मी सितारे अक्सर सफल ...और पढ़ें

परदे के महानायक बनते हैं 'जननायकन'।                  (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

परदे के महानायक बनते हैं 'जननायकन'। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)


HighLights

  1. दक्षिण भारत में सिनेमा-राजनीति का गहरा संबंध।

  2. एमजीआर, करुणानिधि, एनटीआर जैसे दिग्गजों का उदय।

  3. पवन कल्याण, विजय जैसे सितारे आज भी सक्रिय।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दक्षिण भारत के सार्वजनिक जीवन में सिनेमा और राजनीति का संबंध मात्र पेशा बदलने जैसा नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक मिलन है। दशकों से यहां रुपहले परदे की वीरता और विधायी नेतृत्व के बीच की सीमा बेहद धुंधली रही है। करिश्माई सितारों ने अपनी फिल्मी छवि और क्षेत्रीय अस्मिता के अनूठे मिश्रण से सत्ता के गलियारों तक का सफर तय किया है।

सत्ता के शिखर तक

दिग्गजों का उदय इस सफर की शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में एम. करुणानिधि, एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और एन.टी. रामा राव (एनटीआर) जैसे दिग्गजों ने की थी।

करुणानिधि ने एक क्रांतिकारी पटकथा लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाई और पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। वहीं, 'जनमानस के नायक' एमजीआर ने 1977 में मुख्यमंत्री बनकर लोक कल्याणकारी राजनीति की एक नई मिसाल पेश की, जिसे उनकी उत्तराधिकारी 'अम्मा' जयललिता ने आगे बढ़ाया।

आंध्र प्रदेश में एनटीआर ने परदे पर भगवान कृष्ण और राम की भूमिका निभाकर जो सम्मान पाया, उसे 'तेलुगु गौरव' की लहर में बदलकर मात्र नौ महीनों में मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली। बदलते समय के साथ नए समीकरण समय बदला, लेकिन सितारों का राजनीति से मोह कम नहीं हुआ। पवन कल्याण ने लंबे संघर्ष के बाद 2024 में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री का पद संभाला, जबकि उनके भाई चिरंजीवी राजनीति में वह जादू नहीं दिखा सके।

कर्नाटक में डॉ. राजकुमार ने बिना चुनाव लड़े 'किंगमेकर' की भूमिका निभाई, तो केरल में सुरेश गोपी ने 2024 में भाजपा के लिए पहली लोकसभा सीट जीतकर इतिहास रच दिया। वहीं, तमिलनाडु में 'कैप्टन' विजयकांत ने एक मजबूत विकल्प पेश किया, लेकिन शिवाजी गणेशन और रजनीकांत जैसे महानायक चुनावी गणित या स्वास्थ्य कारणों से वह सफलता नहीं दोहरा पाए जिसकी उनसे उम्मीद थी। आज यह परंपरा थमी नहीं है।

'रियल स्टार' उपेंद्र 'प्रजाकीय' के माध्यम से राजनीति के ढांचे को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, तो थलपति विजय ने 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) के जरिये अपने विशाल प्रशंसक वर्ग को एक अनुशासित राजनीतिक कैडर में बदल दिया है। दक्षिण भारत में सिनेमा आज भी राजनीति को आकार दे रहा है, जो यह साबित करता है कि अभिनेता-राजनेता का मॉडल कोई पुरानी याद नहीं, बल्कि एक जीवंत सच्चाई है।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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