नई द‍िल्‍ली [जागरण स्पेशल]। जैसे-जैसे सोशल मीडिया का दायरा बढ़ा, मोबाइल फोन उपयोग में समय भी अधिक खपाया जाने लगा। सर्वे बता चुके कि युवा रोजाना तीन से चार घंटे का समय अपने मोबाइल फोन पर बिता रहे। शायद आप नहीं जानते होंगे कि आपके मोबाइल फोन से एक ऐसी खतरनाक लाइट निकलती है जो आपके आंखों की राेशनी तक छीन सकती है। जितनी ज्यादा देर फोन पर बिजी रहेंगे, बीमारी की चपेट में आने की आशंका उतनी ही ज्यादा रहेगी।  

जान‍िए कैसी है यह खतरनाक लाइट 
मोबाइल फोन से निकलने वाली नीले रंग की रोशनी सामान्य नहीं होती। यह  बेहद खतरनाक है। दिन में तो सूरज की रोशनी होने के कारण यह सीधे नहीं दिखती। रात को फोन इस्तेमाल के दौरान यह नीली रोशनी सीधे रेटिना पर असर डालती है। चीन में हुए एक शोध में साबित हो चुका है क‍ि एक महिला रोजाना सोते वक्त और सोकर उठने के तुरंत बाद फोन का इस्तेमाल करती थी। एक साल में उस महिला का कॉर्निया इसी नीली लाइट के कारण क्षतिग्रस्त हो गया। इसके अलावा नेत्ररोग विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल स्क्रीन पर लगातार देखते रहने से आंखों का ब्लिंकिंग रेट कम हो गया है। सामान्य तौर पर प्रति मिनट 12 से 14 बार आंखें ब्लिंक करती हैं, लेकिन मोबाइल स्क्रीन पर बने रहने पर ब्लिंकिंग रेट छह से सात हो जाता है। इससे आंखों में ड्राइनेस बढ़ रही है और आंखें कमजोर हो रही हैं।

20-20-20 का  फार्मूला अपनाएं 
आंखों काे सलामत रखना है तो 20-20-20 का फार्मूला अपनाएं। मसलन, अधिकतम 20 मिनट से ज्‍यादा वक्‍त तक फोन का इस्‍तेमाल न करें। इसके बाद कम से कम 20 सेकेंड के लिए रुकें जरूर। फोन या डेस्‍कटाप से निगाह हटाएं। टीवी आदि की स्‍क्रीन बीस फीट की दूरी पर रहेगी तो आंखें सलामत रहेंगी। 

यह भी कम नुकसानदेह नहीं 

मोबाइल से निकलने वाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगें हमारे स्वास्थ्य  लिए नुकसानदेह हैं। इन किरणों के कारण हमारी याददाश्त और सुनने की शक्ति प्रभावित हो सकती है। इससे निकलने वाले रेडिएशन के कारण कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। मोबाइल फोन और उसके टावरों से होने वाले रेडिएशन से नपुंसकता और ब्रेन ट्यूमर हो सकता है।

जानिए कैसे कम हो खतरा 
जब आपकी स्क्रीन पर दिखे कि सिग्नल पूरे हैं, तभी फोन का इस्तेमाल करें। सिग्नल कमजोर होने पर इसका असर रेडिएशन के रूप में पड़ता है इस दौरान मोबाइल को सिग्नल लिए मशक्कत करनी पड़ती है। कई शोधों में भी यह सामने आया है कि रेडिएशन का खतरा कमजोर सिग्नल के कारण ज्यादा होता है। पैंट के आगे के पॉकेट में फोन रखने से बचें, इससे नपुंसकता का खतरा होता है। इसके अलावा इसे दिल के पास न रखें और रात को सोते वक्त तकिये के नीचे तो कतई न रखें। तकिये के नीचे रखने से इसके रे‍डिएशन के कारण याददाश्त कमजोर हो सकती है। इसके अलावा फोन के ज्यादा गर्म होने की वजह से कई बार आग लगने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। बात करते समय फोन काे शरीर से दूर रखें। इससे रेडिएशन से कुछ हद तक बचाव संभव हो सकेगा। इसके लिए ईयर फोन का इस्‍तेमाल किया जा सकता है। कोशिश कीजिए क‍ि अधिकतम बातचीत मैसेज व चैटिंग के जरिए हो। 

रेडिएशन भी कम खतरनाक नहीं 
एक सर्वेक्षण से पता चला है कि रेडियों तरंगों के रेडिएशन से उन चूहों के दिमाग डैमेज हो गए जिन पर ये शोध किया गया था। इलेक्ट्रि‍क फील्ड दीवारों या किसी अन्य फील्ड से ढके होते हैं, लेकिन रेडियोधर्मी अधिकांश दीवारों को पार कर सकते हैं। दरअसल मोबाइल से निकलने वाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगे हमारे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए नुकसानदेह हैं। इन किरणों के कारण हमारी याददाश्त और सुनने की शक्ति प्रभावित हो सकती है। इससे निकलने वाले रेडिएशन के कारण कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। मोबाइल फोन और उसके टावरों से होने वाले रेडिएशन से नपुंसकता और ब्रेन ट्यूमर हो सकता है।

रोजमर्रा की इन मशीनों से भी खतरा  
वॉशिंग मशीन, डिश वॉशर, वैक्यूम क्ली‍नर, लैपटॉप से लेकर साधारण से दिखने वाले हेयर ड्रायर से इलेक्ट्रिक मैग्नेटिक तरंगे निकलती हैं। हालांकि इन मशीनों के उपयोग से डीएनए बहुत ज्‍यादा परिवर्तित नहीं होता। मगर इनसे निकलने वाली तरंगों से नुकसान तो है ही। रेडिएशन के कारण सेल्स और टिश्यूज़ का विकास प्रभावित होता है। गर्भवती महिलाओं, नवजात और बढ़ते बच्चों पर इनका ज्यादा असर पड़ता है।

यह है ट्राई का नियम  
भारत में मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन का खतरा कम करने के लिए भारतीय दूरसंचार मंत्रालय ने वर्ष 2012 में कुछ नियम बनाए थे। ताकि बढते कैंसर पर रोकथाम हो सके। इस नए कानून के तहत प्रत्येक मोबाइल फोन का अधिकत्तम स्पेसिफिक एब्जार्प्शन यानी एसआर (सार) रेट का स्‍तर 1.6 वॉट प्रति किग्रा होगा। जबकि इससे पहले ये मानक 2 वॉट प्रति किग्रा था। इसका 1 ग्रा रेडिएशन भी शरीर के लिए नुकसानदेह है।

रेटिना पर अटैक

रात में जब आप अपना फोन इस्तेमाल करते हैं, तो उससे निकलने वाली नीली रोशनी सीधे रेटिना पर असर करती है। इस वजह से धीरे-धीरे देखने की क्षमता कम होने लगती है। पूर्व में किए गए शोध में यह साबित हो चुका है कि रोजाना यदि यह रोशनी आंखों पर सीधे पड़ती रहे तो एक वक्त के बाद दिखना बंद हाे सकता है।

पड़ेगा यह असर 
दिनभर काम करते रहने से आंखों को आराम नहीं मिलता। सोते वक्‍त भी फोन देखें तो आंखें ड्राई हो जाती हैं। खुजली और जलन होने लगती है। लगातार ऐसा करने से आंखों की अश्रु ग्रंथि (जहां से आंसू आते हैं) पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

एलईडी भी कम खतरनाक नहीं 
अब ज्यादातर उपकरणों में एलईडी स्क्रीन लगाई जा रही है, जबकि पहले सीआरटी और एलसीडी का ज्यादा उपयोग होता था। डॉक्टरों के अनुसार एलईडी लाइट या उपकरणों से निकलने वाली ब्राइटनेस ज्यादा होती है। अगर आंखों की ब्लिंकिंग सामान्य नहीं है तो इससे ब्रेन पर भी प्रभाव पड़ता है। कई मामलों में ब्रेन को ज्यादा काम करना पड़ता है। ब्लिंकिंग सामान्य रहने से आंखों को आराम मिलता है तो बॉडी भी रिलेक्स रहती है।

 

Posted By: Abhishek Pandey