यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 04, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Plastic Ban: सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध का फैसला सीमित लेकिन महत्वपूर्ण कदम
Single-Use Plastic Ban सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध का फैसला सीमित लेकिन महत्वपूर्ण है। इसकी सफलता के लिए हम सबको ...और पढ़ें

सुनीता नारायण। देश में सिंगल यूज प्लास्टिक की श्रेणी में आने वाले कई उत्पादों पर रोक लगा दी गई है। वैसे तो सिंगल यूज यूज प्लास्टिक पर लगा यह प्रतिबंध कुल प्रयोग होने वाले प्लास्टिक की तुलना में बहुत कम है, लेकिन इस संकट से निपटने की दिशा में अहम कदम अवश्य है। हमें प्लास्टिक से उपजे संकट के बारे में किसी चेतावनी की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम रोज इसका सामना कर रहे हैं। हमारे शहर ऐसे प्लास्टिक मैटेरियल से भरे पड़े हैं, जिनसे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। इससे निपटने के लिए हमें तीन चरणों वाली नीति पर कदम बढ़ाना होगा। पहला, प्रयोग के बाद प्लास्टिक कचरे को एकत्र किया जाए। दूसरा, प्लास्टिक कचरे को लैंडफिल में भेजने के बजाय रीसाइकिल किया जाए या जला दिया जाए। तीसरा, रीसाइकिल या नष्ट करने की प्रक्रिया ऐसी हो, जिससे पर्यावरण को या उस प्रक्रिया में काम करने वाले लोगों को खतरा न हो।
इन तीन चरणों के साथ ही एक अहम कदम यह है कि ऐसे प्लास्टिक उत्पाद जिन्हें एकत्र करना या रीसाइकिल करना मुश्किल हो, उनका प्रयोग बंद कर देना चाहिए। वर्तमान प्रतिबंध इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इसका लक्ष्य रोजाना प्रयोग वाले ऐसे उत्पादों की पहचान करना है, जिन्हें एक बार प्रयोग करके फेंक दिया जाता है। इसीलिए ईयर बड, कटलरी, स्ट्रा और 120 माइक्रोन से कम के कैरी बैग को प्रतिबंधित किया गया है। यह फैसला प्लास्टिक के खिलाफ लड़ाई के लिए निर्णायक है। यह हमें तय करना है कि इससे प्लास्टिक-मुक्त समाज की राह निकले या यह विफल प्रयास बनकर रह जाए।
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इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अभी लगाया गया प्रतिबंध पूर्ण नहीं है। सिंगल यूज प्लास्टिक से छुटकारा पाना है तो इस सूची में मल्टी लेयर्ड पैकेजिंग को भी रखा जाना चाहिए। चिप्स से लेकर शैंपू और गुटखे तक कई उत्पादों में ऐसी पैकेजिंग होती है। यह पैकेजिंग बहुत बड़ा संकट है। इन्हें एकत्र कर पाना और रीसाइकिल कर पाना लगभग असंभव होता है। इस कचरे से निपटने का एकमात्र तरीका यही है कि इन्हें सीमेंट प्लांट में ईंधन के तौर पर जलाने के लिए भेज दिया जाए। बहुत से लैंडफिल में यह कचरा बड़ी मात्रा में रहता है। वैसे तो पैकेजिंग मैटेरियल को लेकर एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पांसिबिलिटी (ईपीआर) नोटिफिकेशन प्रभावी है। इसके तहत पैर्केंजग मैटेरियल बनाने वाली कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह इन्हें एकत्र करे और रीसाइकिल करे। कंपनियों के स्तर पर सालाना लक्ष्य भी रखे गए हैं कि उन्हें कितना मैटेरियल रीकलेक्ट करना है। कागजों में यह व्यवस्था बहुत सही लगती है, लेकिन असली समस्या इसके क्रियान्वयन में है।
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उदाहरण के तौर पर, इस बात का कोई आंकड़ा ही नहीं है कि कोई कंपनी कितना पैकेजिंग मैटेरियल बना रही है। यह सब सेल्फ डिक्लेरेशन पर निर्भर है और उसकी पुष्टि करने का कोई तरीका नहीं है। कंपनियां ईपीआर लक्ष्य पूरा करने के लिए अपनी तरफ से पैकेजिंग मैटेरियल को एकत्र करने का काम प्रोड्यूसर रेस्पांसिबिलिटी आर्गनाइजेशन (पीआरओ) को दे देती हैं।

पीआरओ को नगर निकायों से कचरा मिलता है। उनके कर्मचारी एल्युमीनियम टिन से लेकर पाउच तक विभिन्न पैकेजिंग मैटेरियल को पृथक करते हैं। समस्या उस कचरे के साथ आती है, जिन्हें रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है। कई पीआरओ के परिसर में व्यवस्थित तरीके से रखे हुए ऐसे कचरे का पहाड़ खड़ा हो रहा है। इनके निपटारे का अंतिम तरीका यही होता है कि उन्हें सीमेंट कारखाने में जलाने के लिए पहुंचा दिया जाए। हालांकि कई बार इस प्रक्रिया में आने वाले खर्च के कारण कंपनियां ऐसा भी नहीं करती हैं और बस पहाड़ बनता जाता है। अगले चरण में इस दिशा में प्रयास आवश्यक है। मुझे इस बात की पूरी संभावना दिखती है कि वर्तमान प्रतिबंध के सफल क्रियान्वयन के बाद इस ओर कदम बढ़ाए जाएं।
[महानिदेशक, सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट, नई दिल्ली]
