नई दिल्ली, पीटीआइ। धरती पर मौजूद ज्वालामुखी सक्रिय होने की घटनाएं भारतीय उप महाद्वीप में मानसून की संभावनाओं का बेहतर ढंग से संकेत कर सकती हैं। यह बात भारत और जर्मनी के वैज्ञानिकों के संयुक्त अध्ययन में पता चली है। यह अध्ययन पुणे की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रोपिकल मेट्रॉलॉजी (Indian Institute of Tropical Meteorology, IITM) और पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (Potsdam Institute for Climate Impact Research, PIK) जर्मनी के वैज्ञानिकों ने किया है।

अध्ययन में पाया गया है कि ज्वालामुखी सक्रिय होने की घटनाओं से सूखे या अत्यधिक वर्षा का अनुमान लगाया जा सकता है। आइआइटीएम में पर्यावरण बदलाव संबंधी शोध शाखा के प्रमुख आर कृष्णन ने बताया है कि ज्वालामुखी फटने से निकलने वाली गैसें और छोटे-छोटे कण आकाश में पहुंच जाते हैं और वे कई वर्षों तक वायुमंडल में बने रह सकते हैं। ये कण सूर्य की किरणों को धरती तक पहुंचने में रोकते भी हैं। इसके चलते अल-नीनो जैसे तूफान समुद्र में उठते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि जब सूर्य की किरणें बाधित होती हैं तो तापमान परिवर्तन की संभावना पैदा होती है।

बता दें कि अल-नीनो ऐसी परिघटना है जो प्रशांत महासागर के जल के गर्म होने से संबद्ध है। व्यापक रूप से यह भी माना जाता है कि इसका भारतीय मानसून पर प्रभाव पड़ता है। वायुमंडल के उत्तरी और दक्षिणी भाग के तापमान में होने वाला परिवर्तन ही धरती पर होने वाली कई तरह की मौसम संबंधी घटनाओं का कारण बनता है। अध्ययन में पाया गया है कि बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी विस्फोट होने से प्रशांत महासागर के ऊपर और भारतीय मानसून पर गर्म अल-नीनो का संयोग बढ़ने की संभावना होती है।

इससे सूखा पड़ने की संभावना बढ़ती है जबकि इसके विपरीत प्रशांत महासागर के ऊपर ला-नीना परिघटनाओं के होने से अत्यधिक बारिश होने की स्थितियां बनती हैं। जर्मन संस्थान के नोरबर्त मरवान ने कहा कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर और भारतीय मानसून के बीच संबंधों में समय के साथ बदलाव आया है। उन्‍होंने इस बदलाव के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्‍मेदार बताया। मरवान ने कहा कि इसके चलते मानसून का सटीक अनुमान नहीं लग पा रहा है। मानसून के बारे में यह अध्‍ययन भारत में खेती के कार्यों की योजना बनाने के लिए महत्‍वपूर्ण है...  

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