नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। भारत के चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम (Vikram) का शनिवार को इसरो मुख्‍यालय से संपर्क उस वक्‍त टूट गया जब वह चांद की सतह से केवल 2.1 किलोमीटर की दूरी पर था। भारतीय वैज्ञानिकों का मनोबल न टूटे इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने सुबह आठ बजे इसरो मुख्‍यालय पहुंचकर वैज्ञानिकों का हौसला आफजाई किया। इसरो की ओर से इस घटना के बारे में विस्‍तार से जानकारी अभी नहीं सामने आई है। लेकिन, दुनिया के वैज्ञानिकों का कहना है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation, ISRO) का मिशन चंद्रयान-2 फेल नहीं हुआ है। आइये जानते हैं इस बारे में वैज्ञानिकों की क्‍या राय है... 

डाटा संग्रह और विश्‍लेषणों पर हो फोकस
DRDO के पूर्व वैज्ञानिक, रवि गुप्‍ता ने मिशन चंद्रयान-2 के लिए इसरो की सराहना करते हुए कहा कि भले ही लैंडर विक्रम का संपर्क हमसे टूट गया हो आर्बिटर अभी भी चंद्रमा की सबसे नजदीकी कक्षा में चक्‍कर लगा रहा है। इस लिहाज से इस मिशन को हम असफल नहीं कह सकते हैं। मौजूदा वक्‍त में हमारा ध्‍यान डाटा संग्रह और इसके विश्‍लेषणों पर होना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह बेहद जटिल मिशन था, हमारे वैज्ञानिक लोगों की समस्‍याओं के निदान में अभी लगे हुए हैं। आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनकी कोशिशें लगातार जारी हैं। इसकी सफलता आने वाले दिनों में इसरो के लिए नए रास्‍ते खोलगी।

बहुत सारे सबक सीखने को मिले
इसरो के पूर्व अध्‍यक्ष जी. माधवन नायर ने कहा कि चंद्रयान-2 ने अपने मिशन के 95 फीसद लक्ष्‍यों को हासिल कर लिया है। चंद्रयान-2 कई लक्ष्‍यों वाला मिशन था। हमें बहुत ज्‍यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर अभी भी सही तरीके से काम कर रहा है। लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर के रूप में मिशन का सिर्फ पांच फीसद ही नुकसान हुआ है, बाकी 95 फीसद के रूप में ऑर्बिटर अपना काम कर रहा है। वैज्ञानिक गौहर रजा ने भी इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि इस मिशन को असफल नहीं कहना चाहिए। चंद्रयान-2 का जो उद्देश्‍य था उसे चंद्रयान -3 द्वारा हासिल कर लिया जाएगा। अंतिम क्षणों में आई इस मुश्किल से बहुत सारे सबक सीखने को मिले हैं। हम आने वाले दिनों में निश्चित रूप से स्‍पेस तकनीक के मास्‍टर बनेंगे।

भविष्य के अभियानों में मददगार होगी यह कोशिश
नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्री जेरी लिनेंगर ने कहा कि विक्रम लैंडर की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की साहसिक कोशिश से मिला अनुभव भारतीय वैज्ञानिकों को भविष्य के अभियानों में मददगार साबित होगा। साल 1986 से 2001 तक पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित रूसी अंतरिक्ष केंद्र मीर में पांच महीने तक बीताने वाले लिंनेंगर ने कहा कि भारत कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहा है जो बहुत ही कठिन है। लैंडर से संपर्क टूटने से पहले सब कुछ योजना के मुताबिक काम कर रहा था। दुर्भाग्यवश लैंडर चंद्रमा की सतह से 400 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद होवर प्वाइंट तक नहीं पहुंच सका। यदि ऐसा हो जाता तो रडार अल्टीमीटर और लेजर का प्रशिक्षण हो जाता। भारतीय वैज्ञानिकों की यह कोशिश निश्चित तौर पर आने वाले अभियानों के लिए मददगार साबित होगी। ऑर्बिटर अगले एक साल तक बहुमूल्य जानकारी देना जारी रखेगा।  

Posted By: Krishna Bihari Singh

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